Thursday, September 17, 2009

जसवंत सिंह! क्या पाकिस्तान सरदार पटेल की करनी है?

जसवंत सिंह ने अपनी पुस्तक में विभाजन और जिन्ना की निर्दोष भूमिका पर बहुत गंभीर चर्चा की है। गहरा विश्लेषण है उनकी पुस्तक में, जो जो उद्धरण जिन्ना के खिलाफ जाते हैं उन उद्धरणों को भी उन्होंने कुशलतापूर्वक जिन्ना और पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा कर दिया है। लेकिन इनके सबके बीच उनकी एक या दो-दो पंक्ति की टिप्पणियां, उनके सुदीर्घ विश्लेषण के संक्षिप्त निष्कर्ष बहुत ही सतही और पूर्वाग्रही मानसिकता से प्रेरित प्रतीत होते हैं। आइए कुछ टिप्पणियों पर गौर फरमाएं।

पुस्तक के हिंदी संस्करण के पृष्ठ 465 पर जसवंत सिंह अपनी पुस्तक का निष्कर्ष दो पंक्तियों में लिखते हैं- ‘निष्कर्ष साफ है कि आखिर में पाकिस्तान जिन्ना को दे दिया गया। जिन्ना ने जितना उसे जीता नहीं उससे ज्यादा तो कांग्रेस के नेताओं ने, नेहरू और पटेल ने इसे दे दिया और इसमें अंग्रेजों ने हमेशा मदद करने वाली एक कुशल दाई का काम किया।’
‘जिन्ना ने जोर देकर कहा कि इलाज केवल अलग होने में है और नेहरू, पटेल और कांग्रेस के अन्य लोग अंतत: इससे सहमत हो गए, पाकिस्तान बन गया।’ (पृष्ठ 445)
‘भारत की एकता की खिलाफत करने वाले अनेक कारक थे। बंटवारा तो होना ही था, परंतु साथ ही उन दिनों एक जबर्दस्त थकावट ने अंग्रेजों को, नेहरू को, जिन्ना को, यहां तक कि पटेल समेत सभी को जकड़ लिया था। गांधीजी ने अकेले ही, इस बंटवारे को विखंडन का नाम दिया, केवल वह ही थे जिन्होंने शुरू से इसका विरोध जारी रखा। लेकिन अब तो वे एक अकेले ही जिहादी बचे थे, शायद इसीलिए अब उन्होंने भी अपने हाथ-पैर समेट लिए।’ (पृष्ठ-457)

पृष्ठ 383 पर जसवंत सिंह सरदार पटेल के एक पत्र को उद्धृत करते हुए लिखते हैं- ‘पटेल ने भले ही सीधे तौर पर नहीं किंतु वास्तव में पहली बार पंजाब और बंगाल के विभाजन की शर्त पर बंटवारे को स्वीकारा था।…।8 मार्च, 1947 को कांग्रेस कार्यसमिति ने जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल के समर्थन से एक प्रस्ताव पारित किया…इस प्रस्ताव ने जिन्ना के दो राष्ट्र वाले सिद्धांत को अंतत: मंजूरी दे दी।’

जसवंत सिंह लार्ड माउंटबेटन के बहाने सरदार पटेल पर पृष्ठ 384 पर टिप्पणी करते हैं-’माउंटबेटन तब तक वायसरॉय का पदभार ग्रहण कर चुके थे। उन्होंने तुरंत पटेल को बातचीत के लिए आमंत्रित किया। एक विजेता की तरह उनका यह आकलन था कि पटेल ने पंजाब के विभाजन को मंजूरी देकर भारत के विभाजन के सिद्धांत को भी मान्यता दे दी। जवाहर लाल नेहरू का भी विभाजन विरोध तब तक काफी हद तक हल्का पड़ चुका था। 20 मार्च, 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन के भारत आने के एक माह के अंदर ही अंदर इतने वर्षों तक विभाजन के मुखर विरोधी जवाहर लाल नेहरू मुल्क के बंटवारे के एक प्रतिबद्ध समर्थक बन गए।’
जसवंत सिंह का मानना है कि 1947 में नेहरू और पटेल दोनों देश की हकीकत से अनजान थे । पृष्ठ संख्या 464 पर वे लिखते हैं-
”दु:ख से कहना पड़ता है कि कांग्रेस के नेतृत्व ने हकीकत को, असलियत को कभी पूरा नहीं पहचाना, मंजूर नहीं किया। 15 अगस्त 1947 से दो हफ्ते पहले माउंटेबटन ने नेहरू और पटेल दोनों से पूछा था: ‘एक पखवाड़े के भीतर ही भारत की पूरी सत्ता और ज़िम्मेदारी आपके पास होगी। ‘क्या आप लोगों ने महसूस किया है कि तब आपको किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ेगा?” दोनों नेताओं ने तब जवाब दिया था कि हमें ‘मालूम है, और वह भी कि हमें क्या करना है।’ लेकिन क्या वास्तव में ऐसा था? लगता है नहीं।’ (पृष्ठ-464)

इसी संदर्भ में अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने के लिए कांग्रेस द्वारा छेड़े जाने वाले तमाम आंदोलनों और नेताओं के जेलगमन पर जसंवत सिंह की टिप्पणी भी अत्यंत उपहासास्पद प्रतीत होती है। वे लिखते हैं कि – ”बार-बार के जेल-गमन ने कांग्रेसियों में, जिनमें अधिकांश हिन्दू थे, एक स्थाई षहादत की आत्मसंतुष्टि का बोध भर दिया था। इसलिए उन्होंने पहले ही मान लिया था कि जेल-गमन ही अपने आप में पर्याप्त तपस्या व त्याग है, जिसे एक सराहनीय कार्य के रूप में निश्चित तौर पर दैवीय मान्यता मिलेगी……। लेकिन जेल में बार-बार रहने से कांग्रेस नेता…।वस्तुत: एक प्रकार से जिम्मेदारी टाल रहे थे। 1942-45 के बीच कांग्रेस नेतृत्व के जेल जीवन की निष्क्रियता की तुलना में जिन्ना ने अपने नेतृत्व को और मजबूत किया।” (पृष्‍ठ-460)

इस प्रकार जिन्ना प्रेम की रौ में जसवंत सिंह सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और आजादी के संघर्ष के तमाम बलिदानियों का मजाक उड़ाने से नहीं हिचकते हैं। माना कि जेल जीवन एक निष्क्रिय जीवन है किंतु देश की जनता ने जिस महान् उद्देश्‍य के लिए इस संघर्ष पथ का वरण किया, क्या वह उद्देश्‍य गलत था? क्या वे जेल जाने के शौकीन थे? आखिर जसवंत क्या सिध्द करना चाहते हैं?

हिंदी संस्करण के पृष्ठ क्रमांक 422 पर जसवंत सिंह सरदार पटेल को एक बार फिर से आलोचना का अनावश्यक पात्र बना देते हैं। वे लिखते हैं-’आखिर, मुहम्मद अली जिन्ना दिल्ली से कराची को 7 अगस्त, 1947 को रवाना हो गए। इसके बाद लौटकर वह कभी भारत नहीं आए। अगले ही दिन, पटेल ने दिल्ली में, संविधान सभा में तब कहा था, ‘ भारत के शरीर से जहर निकाल दिया गया है। अब हम एक हैं और अविभाज्य हैं, क्योंकि आप समुद्र को या नदी के जल को विभाजित नहीं कर सकते और जहां तक मुसलमानों का सवाल है, उनकी जड़ें यहां हैं, उनके पवित्र स्थल यहां हैं। मैं नहीं जानता कि वे पाकिस्तान में क्या करेंगे। वह वक्त दूर नहीं जब वे वापस लौटें।’

अब सरदार पटेल के इस वक्तव्य पर जसवंत सिंह को कड़ी आपत्ति है। जसवंत सिंह के अनुसार – ‘इस प्रकार के वक्तव्यों ने पाकिस्तान के सामने चुनौती खड़ी कर दी कि वह पाकिस्तान को बरकरार रख कर दिखाए। पाकिस्तान के रूप में बने रहना ही पाकिस्तान का मकसद बन गया। प्रधानमंत्री नेहरू ने भी इसी प्रकार एक टिप्पणी की कि हमें देखना है कि वे कब तक अलग रहते हैं। ऐसी टिप्पणियों पर पाकिस्तान के नागरिक काफी सतर्कता से ध्यान देते हैं।’ (पृष्ठ-422)

ठीक कहा जसवंत जी ने। विभाजन का समर्थन भी गलत और विरोध भी गलत! विभाजन के खिलाफ यदि पटेल और नेहरू ने वक्तव्य दिया तो उसे भी जसवंत सिंह ने चतुराई से इन्हीं नेताओं के खिलाफ खड़ा कर दिया। जसवंत सिंह के शब्दों में, विभाजन स्वीकार करके तो इन नेताओं ने गुनाह किया ही था।

पृष्ठ 413 पर जसवंत सिंह विभाजन के एक प्रमुख कारण का जिक्र करते हुए उसमें भी मुस्लिम लीग को निर्दोष साबित करने की कोशिश करते हैं- ‘यहां एक कारण और है जिस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है जिसकी वजह से शायद कांग्रेस ने विभाजन को मंजूरी दी थी। यह शिकायत थी कि अंतरिम सरकार ने न तो समरसता के साथ काम किया और न ही एक मंत्रिमंडल की तरह। यद्यपि नेहरू अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री थे लेकिन वे खुद को वास्तविक सरकार के प्रधानमंत्री की तरह प्रस्तुत कर रहे थे। ऐसा व्यवहार वित्त मंत्री लियाकत अली खां के नकारात्मक काम से और अधिक खराब हो गया क्योंकि उन्होंने जानबूझ कर योजनाओं को विफल कर दिया। अंतरिम मंत्रिमंडल इसलिए भी असफल रहा क्योंकि सबसे पहले नेहरू चाहते थे कि उन्हें एक अधिकृत मंत्रिमंडल का वास्तविक प्रधानमंत्री समझा जाए। यह एक ऐसा दावा था जिसका कि मुस्लिम लीग ने घोर विरोध किया।’
अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस नेताओं को क्या अनुभव आए, इस पर ही यदि कोई शोध करना चाहे तो पूरी किताब लिखी जा सकती है। सुविज्ञ पाठकों को ध्यान में रखना चाहिए कि अंतरिम सरकार में शामिल मुस्लिम लीग न सिर्फ पाकिस्तान प्राप्त करने वरन् हिन्दुस्तान को कई टुकड़ों में विभाजित करने की योजना पर गहराई से काम कर रही थी। इसके लिए लीग के मंत्री सरकारी मशीनरी की पूरी सहायता ले रहे थे। जसवंत सिंह जी ने अंतरिम सरकार के अनुभवों को जिस तरह से कुछ पन्नों में और वह भी नेहरू-पटेल के खिलाफ अपने तर्कों को मजबूती देने के लिए इस्तेमाल किया है, इसे किसी भी प्रकार से स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अब जरा देखिए कि द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की विफलता के लिए दोष किस प्रकार पंडित मदन मोहन मालवीय और अन्य नेताओं पर मढ़कर जसवंत सिंह मुस्लिम लीग को विभाजन संबंधी सारे आरोपों से बरी करते हैं।

पृष्ठ 184 पर आगा खां को उद्धृत करते हुए जसवंत लिखते हैं- ‘महात्मा गांधी ने हमारे होने के महत्व को अच्छी तरह से पहचान लिया था। शायद वे हमारे विचारों से सहमति की राह पर भी थे मगर पंडित मदन मोहन मालवीय और हिंदू महासभा ने हमारे खिलाफ काफी दबाव डाला-उन्होंने निरे अव्यावहारिक राजनीतिक सिध्दांतों और नीतियों के आधार पर ऐसे तर्क रखे जो भारत की वास्तविकताओं से एकदम असंगत थे और 1947 के भारत विभाजन ने इसे साबित भी कर दिया।’

पुन: इसी मुद्दे पर मुहम्मद शफी की बेटी शाहनवाज हुसैन के उद्धरण को रखते हुए जसवंत लिखते हैं-’एक समय ऐसा आया जब मुसलमान और उदारवादी आपस में सहमत भी हो गए थे और एक समझौता वास्तव में संभव लगने वाला था।…यहां तक कि खुशी में शफी ने मिठाई और शराब मंगवा ली थी और मुसलमान प्रतिनिधि इस मौके पर खुशी मनाने के लिए होटल रिट्ज में आगा खां के कमरे में इकट्ठा भी हो गए लेकिन यह पार्टी शुरू भी न हो पाई कि सिखों और हिंदू महासभा की सहमति लेने गए गांधी खाली हाथ ही लौटे। उन्होंने वापस आकर कहा-मैं माफी चाहता हूं कि मैं समझौते के अपने प्रयासों में सफल नहीं हो सका। सिख समुदाय और हिंदू महासभा के लोग प्रस्ताव पर तैयार नहीं है।’

द्वितीय गोलमेज कांफ्रेंस की असफलता और इसमें गांधीजी की भूमिका के बारे में टिप्पणी करते हुए जसवंत अपनी हिंदी पुस्तक के पृष्ठ 185 पर लिखते हैं-’गांधी सांप्रदायिक अपील की शक्ति को जानते थे और वे यह भी जानते थे कि अगर वे सार्वजनिक रूप से हिंदू मांगों के विरूद्ध स्वयं को प्रतिबद्ध करते हैं तो कांग्रेस को इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ सकती है।’

इसी प्रकरण में मुस्लिम लीग और जिन्ना का बचाव करते हुए जसवंत सिंह पृष्ठ 194 पर लिखते हैं-’वास्तव में हिंदू-मुस्लिम एकता में लगातार असफलता मिलना ही जिन्ना की सबसे गहरी निराशा थी। बाद के एक भाषण में जिन्ना ने सन् 1938 में अलीगढ़ एंग्लो-मुस्लिम कॉलेज के छात्रों के सम्मुख यह ख्याल रखे भी थे-’गोलमेज सम्मेलनों की बैठकों से मुझे जीवन का सबसे बड़ा धक्का लगा। मैंने खतरे के सही चेहरे को देखा। हिंदुओं की भावनाओं, उनके दिमाग और उनके रवैये से मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि एकता की अब कोई उम्मीद नहीं रह गई है। इस पर मैंने अपने देश के प्रति काफी निराशा महसूस की। यह स्थिति सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण थी। मुसलमान तब एक ‘नो मेंस लैंड’ में रहने वाले लोगों के समान हो गए थे, वे या तो ब्रिटिश सरकार के गुलाम होते या कांग्रेस खेमे के अनुयायी। जब भी मुसलमानों को संगठित करने के प्रयास किए गए तो एक ओर चापलूसों और गुलामों ने व दूसरी ओर कांग्रेसी खेमे के गद्दारों ने इन प्रयासों को कुंठित किया। मैंने तब महसूस करना शुरू किया कि न तो मैं भारत की मदद कर सकता हूं और न ही हिंदुओं की मानसिकता को बदल सकता हूं।…बहुत निराशा और दु:ख के बाद मैंने लंदन में बसने का फैसला लिया।’

इस पूरे प्रकरण में जसवंत सिंह ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की असफलता के संदर्भ में किसी कांग्रेस नेता या किसी अन्य हिंदू पक्ष का कोई वक्तव्य उद्धृत करना उचित नहीं समझा। आखिर इस प्रकार से मुस्लिम लीग के पक्ष को और जिन्ना के वक्तव्य को विस्तार से उद्धृत करने का क्या मतलब निकाला जाए। अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है कि जो बात और जो तर्क पाकिस्तान इतिहासकार, मुस्लिम लीग के नेता कांग्रेस पक्ष को और हिन्दू नेताओं को दोषी ठहराने के लिए बार-बार दोहराते हैं, उन्हें ही जसवंत सिंह जी ने एक नये आवरण में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। ऐसा कर क्या जसवंत सिंह स्वयं को मुस्लिम लीग का प्रवक्ता नहीं साबित कर रहे हैं?

जसवंत सिंह भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की चिंताजनक स्थिति पर भी बेहद चिंतित स्वर में कहते हैं कि उन्हें आज भी उनके अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। जसवंत सिंह का मानना है कि बंटवारे के समय उठे सवाल अधूरे हैं और उनका उत्तर अभी तलाशा जाना शेष है-
‘आज भारत में सिद्धांत रूप में हम सब समान नागरिक हैं, यह हमारे गणराज्य की नींव का पहला पत्थर है। परंतु क्या सिद्धांत को हम यथार्थ में बदल पाए हैं? इस संविधान को पारित करते ही हमने विशेष अधिकार देने शुरू कर दिए। लेकिन चुने हुए रूप में ही। इसलिए स्वाभाविक है कि भारत के मुसलमान नागरिक भी इसमें हिस्सा मांगें। इस मांग का प्रत्युत्तर हमेशा आहत करने वाले स्वर में ही मिलता है कि अभी भी विशेष अधिकार? पाकिस्तान के बाद भी? क्यों? और इसी वजह से बंटवारे की कभी खत्म न होने वाली कार्यसूची का यह प्रश्न बार-बार उठता है।…बंटवारे ने इन प्रश्नों को और अधिक जटिल बना दिया है…इनका समाधान कैसे होगा?’ (पृष्ठ 439)

पुस्तक में अनेक स्थानों पर जसवंत सिंह ने भारत की प्राचीन एकता और उसे बनाए रखने की प्रबल आवश्यकता को जिन शब्दों में बांधने का प्रयास किया है वास्तव में वह प्रशंसा योग्य है। नि:संदेह जसवंत सिंह की भारत भक्ति पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए लेकिन इन सबके बीच आजादी के आंदोलन में भारत की एकता के सबसे बड़े शत्रु का बचाव कर उन्होंने खुद ही अपनी आलोचना को आमंत्रण दिया। भारत विभाजन पर उनकी एक टिप्पणी सचमुच अंदर तक हमें प्रभावित करने में सक्षम है और ऐसी टिप्पणियां पुस्तक में यत्र-तत्र पढ़ने को मिलती भी हैं -
‘यह हानि केवल व्यक्तिगत नहीं थी और न ही केवल पंजाब या बंगाल में थी। भौगोलिक और आर्थिक रूप से स्थापित हस्तियां, प्राचीन सांस्कृतिक एकता जिन्हें अनुपम रूप से एकात्म होने में हजारों-हजार साल लगे, वह छिन्न-भिन्न करके बिखेर दी गयीं। एक प्राचीन देश का, उसके लोगों का, उनकी संस्कृति का, उनकी सभ्यता का यह ऐतिहासिक सम्मिश्रण जान-बूझकर कई टुकड़ों में खंड-खंड कर दिया गया।’
बहुत सारे गूढ़ सवाल भी जसवंत सिंह ने उठाए हैं। मसलन, आजादी पहले मिलती और बंटवारा बाद में होता जैसा कि गांधी बार बार कह रहे थे तो स्थिति शायद दूसरी होती। अचानक विभाजन के कारण और वह भी किसी सर्जरी के समान, इससे जो मार-काट उस समय मची, हिंदू-मुस्लिम एकता हमेशा के लिए दांव पर लग गई, हिंदू-मुसलमान के नाम पर दो देश अस्तित्व में आ गए, और दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ा कि अनेक मसलों पर संयुक्त राष्ट्र संघ को दखलअंदाजी करनी पड़ गई। क्या इससे बचने का दूसरा रास्ता न था?

जसवंत सिंह का यह कहना भी वाजिब ही लगता है कि ”इस बंटवारे से क्या समाधान हो गया जबकि अल्पसंख्यकवाद आज भी और भयानक रूप लेकर हमारे सामने खड़ा हो गया है। इससे हिंदू-मुस्लिम समस्या कहां सुलझी। समस्या तो आगे के लिए टरका दी गई।”

पुस्तक में अनेक स्थानों पर जसवंत जी की भावना सकारात्मक और अखण्ड भारत के समर्थन में खड़ी दिखाई देती है। चूंकि पुस्तक लेखन का केंद्र जिन्ना हैं इसलिए लेखक को सहज रूप में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है और इतिहास की सच्चाई को दरकिनार कर जिन्ना के कर्मों को जायज ठहराना ही मानों उनका लेखकीय दायित्व बन गया है जिसे उन्होंने भरपूर निभाया भी। जैसा कि पुस्तक के अंतिम अध्याय में वे निष्कर्ष रूप में लिखते हैं- ‘हिंदू-मुस्लिम एकता के राजदूत से पाकिस्तान के कायदे आजम तक जिन्ना की जीवन यात्रा वीरगाथात्मक यात्रा है।…यह जिन्ना का वृत्तांत है-एक व्यक्ति और उसके नायकोचित प्रयासों का। और साथ ही दूसरों के प्रयासों का भी।’ तो इसे साबित करने के लिए वे किसी भी हद को पार करने से नहीं चूके हैं।(पृष्ठ 472-473)

देखिए जसवंत सिंह किस बारीकी से जिन्ना को विभाजन के दोष से मुक्त करते हैं। अंतिम अध्याय में वे लिखते हैं- ‘इस बात को सोचते हुए पीड़ा होती है कि हम इस सौदे (देश विभाजन और सत्ता हस्तांतरण) के लिए भी राजी हो गए और गलत तरीके से हमने इसे सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण की उपाधि भी दे दी। भारत, इस ‘हस्तांतरण’ की कीमत आज भी अदा कर रहा है। निश्चित रूप से यह तो मुहम्मद अली जिन्ना के चुनिंदा मकसदों में कहीं नहीं था, क्योंकि उनकी यात्रा पाकिस्तान का कायदे-आजम बनने की थी। यह तो हमारी खुद की करनी है।’ (पृष्ठ 471)

उपरोक्त दोनों उद्धरण ये बताने के लिए पर्याप्त हैं कि जसवंत सिंह की पुस्तक के पीछे की मूल भाव-भावना क्या है?
जारी …………..
-राकेश उपाध्याय


Wednesday, September 9, 2009

जसवंत सिंह! सरदार पटेल पर उंगली क्यों?

जसवंत सिंह की पुस्तक के अध्ययन से जो निष्‍कर्ष निकलता है उससे साफ है कि पुस्तक जिन्ना की अतिरेकी प्रशंसा के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यह भारतीय राजनीति के स्थापित नेताओं के खण्डन का बौद्धिक प्रयास है।



पुस्तक में लेखक खुद ही अन्तर्द्वन्द्वों के घेरे में एक नहीं अनेक स्थानों पर घिरे नजर आते हैं। वह जो सिद्ध करना चाहते हैं उसके माकूल उद्धरण नहीं मिलने पर वह जिन्ना के खिलाफ भी खड़े होते हैं। लेकिन इसके बावजूद पूर्वाग्रह इतना प्रबल है कि जसवंत सिंह के अनुसार जिन्ना विभाजन का दोषी नहीं था। यह कहने में उनकी हिचकिचाहट बार-बार नजर आती है।


सवाल उठता है कि विभाजन गलत था तो जिन्ना सही कैसे था? माना कि गांधी-नेहरू-पटेल ने विभाजन स्वीकार किया लेकिन ये मांग किसकी थी और यह मांग करने वाला जिन्ना विभाजन के आरोप से बरी कैसे किया जा सकता है?


इतिहास के झरोखे से विविध उद्धरणों को उठाकर जसवंत ने जिन्ना को निर्दोष साबित करने का प्रयास किया लेकिन इतिहास क्या सचमुच जिन्ना को निर्दोष मानता है। यहां सवाल यह भी उठता है कि 1857 की क्रांति के बाद क्या जिन्ना पहले मुसलमान नेता थे जिनका शुरूआती जीवन कथित तौर पर राष्‍ट्रवादी था और कालांतर में वह घोर सांप्रदायिक व्यक्तित्व में परिवर्तित हो गया।

सर सैयद अहमद खां की जीवनी पढ़ें तो क्या वह सार्वजनिक जीवन की शुरूआत में राष्‍ट्रवाद की वकालत नहीं करते थे? क्या उन्होंने ये नहीं कहा था कि हिंदू और मुसलमान भारत मां की दो आंखें हैं। लेकिन बाद में ऐसा क्या हुआ कि सर सैयद हिंदुओं को सरेआम कोसने लगे जबकि उन्हीं हिंदुओं ने उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय की स्थापना में भरपूर सहयोग दिया?


हम चाहे सुहरावर्दी की बात करें या लियाकत अली खां की, रहमत अली की बात करें या अल्लामा इकबाल की, आजादी के आंदोलन में जिन मुस्लिम नेताओं पर भी राजनीति का सुरूर चढ़ा वे जीवन के अंत में कहां जा कर खड़े हुए? यदि इस मानसिकता का अध्ययन होगा तभी भारत विभाजन और तत्कालीन मुस्लिम नेतृत्व का सही अध्ययन हम कर पाएंगे।
इसके विपरीत मक्का में पैदा हुए, मिश्र में पले बढ़े मौलाना अबुल कलाम आजाद, अफगानिस्तान की आबोहवा में पल बढ़े खां अब्दुल गफ्फार खां जैसे नेताओं को देखें तो हम पाते हैं कि वे जीवन की अंतिम सांस तक अपनी मूल भूमि की एकता और अखण्डता के प्रति वफादार रहे।


तो सवाल उठता है कि भारत के मूल प्रवाह के साथ रह रहे मुसलमान नेताओं को क्या कहीं बरगलाया तो नहीं गया? जसवंत कहते हैं कि नहीं, उन्हें तो गांधी-नेहरू और पटेल ने किनारे लगाने का प्रयास किया। जसवंत ने पुस्तक में बार बार कांग्रेस को हिंदू कांग्रेस कहकर संबोधित किया है, आखिर क्‍यों? इतिहास के अध्येता जानते हैं कि चाहे गांधी हों या पटेल या फिर नेहरू, इन सभी नेताओं ने आजादी के आंदोलन में मुस्लिम समुदाय को साथ लाने के लिए अपना सारा जीवन अर्पित कर दिया। अनेक सवालों पर ये नेता हिंदू समाज की मुख्य धारा के खिलाफ भी खड़े हो गए। हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग 1857 की क्रांति की असफलता के बाद भी इस बात पर अडिग था कि सशत्र संघर्ष के रास्ते अंग्रेजों को बाहर खदेड़ा जा सकता है। वासुदेव बलवंत फड़के आदि क्रांतिकारियों ने 18वीं सदी के अंत में ही इस मार्ग को प्रशस्त कर दिया था। लोकमान्य तिलक और योगी अरविंद इस मार्ग के द्वारा आजादी के मार्ग की संभावनाओं को टटोल रहे थे। कालांतर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह ने जिस मार्ग को अपना जीवनपथ ही बना लिया, जिस मार्ग की वकालत वीर सावरकर कर रहे थे, अपने शुरूवाती जीवन में डाक्टर हेडगेवार ने भी जिस मार्ग की वकालत की उस क्रांतिकारी मार्ग पर चलने से भारत के धर्मप्राण समाज को आखिर किसने रोका? क्रांति बलिदान मांगती है, जाहिर है हिंसा के बीज भी इसमें अन्तर्निहित रहते हैं और भारत के इतिहास पर एक विहंगम दृष्टि डालने से स्पष्‍ट भी होता है कि अधर्म के विरूद्ध हिंसक संघर्ष को भारत का लोकजीवन सदा से ही अपना समर्थन देता आया है। हिंदुओं से जुडे सभी पौराणिक ग्रंथ, वैदिक परंपरा, वेद, रामायण, महाभारत और गीता ने न्याय की रक्षा, असत्य के विनाश के लिए इस हिंसक संघर्ष के पथ को मान्य किया है।


लेकिन गांधी, नेहरू और पटेल ने इस परंपरा के विरूद्ध जाकर हिंदुओं को अहिंसा का मंत्र दिया। ये मंत्र सही था अथवा गलत, इसकी मीमांसा समय आज भी कर रहा है और आगे आने वाले समय में भी करेगा। वस्तुत: गांधी-नेहरू पर कोई आरोप लग सकता है तो यही लग सकता है कि इन नेताओं ने हिंदू समाज को सशस्त्र संघर्ष के मार्ग से परे ढकेल दिया इसके विपरीत जिन्ना और उसकी मंडली लड़कर लेंगे पाकिस्तान का नारा बुलंद कर रही थी। खलीकुज्जमां चौधरी, लियाकत अली खां जैसे लीगी नेता जब ये कह रहे थे कि यदि पाकिस्तान का निर्णय तलवार के बल पर होना है तो मुसलमानों के इतिहास को देखते हुए ये ज्यादा महंगा सौदा नहीं है, तो उस समय गांधी और नेहरू आखिर क्या जवाब दे सकते थे जबकि उनके हाथों में तलवार तो क्या एक चाकू भी नहीं था।


इसके विपरीत जिन्ना खुद ही सीधी कार्रवाई का ऐलान कर रहे थे कि हमने अब सभी संवैधानिक उपायों को तिलांजलि दे दी है और हम बता देना चाहते हैं कि हमारी जेब में भी पिस्तौल है। नि:संदेह देश में गृहयुद्ध के हालात पैदा किए जा रहे थे और ये सारा काम मुस्लिम लीग अंग्रेजों की शह पर कर रही थी।


हमने पहले ही ये सिद्ध किया कि जिन्ना ने कभी आजादी के किसी आंदोलन में भाग नहीं लिया। गांधी के सन् 1915 में भारत आने के पहले भी नहीं और बाद में भी नहीं। कांग्रेस पक्ष में भी वह मुसलमानों का वकील बनकर खड़ा दिखाई देता था यद्यपि व्यक्तिगत जीवन में उसका ईश्‍वर, अल्लाह या ऐसी किसी पराशक्ति के उपर शायद ही कोई विश्‍वास था। उसका जीवन ऐशो आराम और भोग की चरम पराकाष्‍ठा पर था। इसके बावजूद जब जसवंत सिंह गांधी को प्रांतीय और धार्मिक नेता कहते हैं और जिन्ना को राष्‍ट्रवादी तो हंसी आती है। जरा देखिए कि गांधी 1915 के बाद देश में क्या कर रहे हैं और जिन्ना किस काम में लगे हैं। गांधी एक ओर चम्पारण में नीलहे किसानों के साथ खड़े हैं, गुजरात में बारडोली के किसानों के पक्ष में सरदार पटेल का साथ दे रहे हैं तो दूसरी ओर जिन्ना लखनऊ में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मण्डलों के आरक्षण के सवाल पर बहस कर रहे हैं। और इससे जो समय बचता है तो अपने एक पारसी मित्र दिनशा पेटिट की 15 साल की लड़की को फुसलाकर भगाने के काम में सक्रिय रहते हैं। जिन्ना अंतत: पेटिट की बेटी डिना को घर से भगा ले जाते हैं। इस पर दिनशा पेटिट जिन्ना के खिलाफ अपनी बेटी के अपहरण का मुकदमा दर्ज करवाते हैं और इतिहास गवाह है कि जिन्ना सन् 1917 से 1918 के बीच फरारी का जीवन व्यतीत करते हैं।


सहज ये सवाल उठता है कि मुसलमानों का नेतृत्व करने की कोई योग्यता जिन्ना में नहीं थी फिर भी उसने मुसलमानों का दिल जीत लिया तो उसके पीछे कारण गांधी, नेहरू या पटेल नहीं थे उसके पीछे का कारण वह विष बेल थी जिसे अंग्रेजों ने हिंदुस्तान में पैदा किया। जिसका ताना बाना लंदन में चर्चिल के नेतृत्व में बुना गया कि हिंदुस्तान वाले यदि आजादी चाहते हैं तो उन्हें ऐसा हिंदुस्तान सौंपो जिसके कम से कम तीस टुकड़े हो जाएं।


जसवंत सिंह क्या बात करेंगे? समय रहते ही अंतरिम सरकार में सरदार पटेल ने मुस्लिम लीग की अंग्रेजों से मिलीभगत को पहचान लिया था। सरदार ने अनेक स्थानों पर इस बात का जिक्र भी किया कि जिन्ना रूपी जहर को निकाला जाना जरूरी हो गया है अन्यथा देश को अंग्रेज एक नहीं दर्जनों टुकड़ों में विभक्त कर देंगे।
और तब जो बरबादी होती क्या उसकी कल्पना किसी ने की थी। सरदार तो पाकिस्तान देने के भी इच्छुक नहीं थे, लेकिन दिल पर पत्थर रखकर उन्होंने इसे स्वीकृति दी। और क्या अंग्रेजों ने सिर्फ पाकिस्तान का ही निर्माण किया? इतिहास गवाह है कि देश की सभी रियासतों को अंग्रेजों ने कह दिया था कि यदि वे चाहें तो भारत के साथ रहें। यदि वे भारत से अलग रहना चाहते हैं तो वे अलग जा सकते हैं।
जसवंत सिंह तो केंद्र में मंत्री रहे हैं। एक कंधार विमान अपहरण से उनके हाथ पैर फूल गए और वे आतंकवादियों को अपने साथ विमान में बिठाकर कंधार रवाना हो गए। सरदार पटेल के सामने क्या परिस्थिति रही होगी जबकि सारे देश की एकता और अखण्डता ही अंग्रेजों ने दांव पर लगा दी थी। देश एक रह पाएगा भी अथवा नहीं, पाकिस्तान का सवाल तो जुदा है क्योंकि उसे तो अंग्रेज मान्यता दे गए थे लेकिन अपरोक्ष रूप से चर्चिल के चेलों ने हिदुस्तान को सैंकड़ों छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटने का जो पांसा फेंका था उससे कैसे निबटा गया यदि उसके कुछ पन्ने भी जसवंत सिंह ने पलटे होते तो उन्हें पता लग जाता कि सरदार देश विभाजन के दोषी थे अथवा देश की एकता को बनाए रखने वाले असरदार नेता थे।


इसी में हैदराबाद के निजाम, जूनागढ़ के नवाब और जोधपुर के महाराज सहित जाने कितने बिगड़ैल घोड़ों पर हिंदुस्तान की एकता की सवारी गांठने का महान कार्य सरदार ने सम्पन्न कर दिखाया, क्या संसार के इतिहास में कहीं अन्यत्र ऐसा उदारहण मिलता है?
देश का दुर्भाग्य कि सरदार आजादी के दो वर्ष बाद ही स्वर्ग सिधार गए अन्यथा जसवंत सिंह जी आपको यह पुस्तक लिखने की नौबत ही नहीं आती। तब शायद जो पुस्तक लिखी जाती उसका शीर्षक होता- ‘पाकिस्तान: निर्माण से भारत में विलय तक’।
जिन्ना प्रेम में सरदार के लौहहृदय का इतना छलपूर्वक और सतही विवेचन आपने क्यों किया जसवंत सिंह, इतिहास आपसे इस सवाल को जरूर पूछेगा। क्या यह सही नहीं है कि सरदार ने शीघ्र ही पाकिस्तान के विनष्‍ट होने की भविष्‍यवाणी की थी? क्या यह सही नहीं है कि सरदार ने जिन्ना और उनके चेलों को चुनौती दी थी कि देखें, कितने दिन तुम पाकिस्तान को अपने साथ रख पाते हो? आप कहते हैं कि कांग्रेस के नेता बूढ़े हो चले थे, ये बात कांग्रेस के नेताओं ने ही स्वीकार की है। लेकिन सरदार भी बूढ़े हो गए थे क्या? क्या उन्होंने अपनी आरामतलबी के लिए देश का विभाजन स्वीकार किया? नेहरू क्या कहते हैं उस पर मत जाइए, सरदार क्या कह रहे थे और क्या कर रहे थे, थोड़ा उस पर ध्यान दीजिए। सरदार एक ओर ह्दय की गंभीर तकलीफ से जूझ रहे थे तो दूसरी ओर देश की तमाम रियासतों के भारत में विलय के लिए संपूर्ण देश में दौड़ भाग कर रहे थे। अपने जीवित रहते ही आजादी के बाद की दो साल की अल्पावधि में उन्होंने उस महान कार्य को पूर्ण कर लिया जिसे करने के लिए भारतीय इतिहास चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक और अकबर को याद करता है। एक चक्रवर्ती भारत, एक बलशाली अखण्ड भारत, भारतीयों द्वारा स्वशासित भारत, देश के करोड़ों आम नागरिकों का अपना भारत, भारत के लिए भारत, समस्त मानवता को दुख-कलह से दूर कर शांति के नए युग का संदेश देता भारत, उस भारत के लिए सरदार जी रहे थे, संघर्ष कर रहे थे।
इतिहास के अध्येता जिन्होंने भी सरदार के जीवन का सूक्ष्मता से अध्ययन किया है वह ये मानने से शायद ही इंकार करें कि सरदार 10 वर्ष और जीवित रह गए होते तो पाकिस्तान का अस्तित्व समाप्त हो जाता। सरदार पंचशील और अहिंसा की मीठी-मीठी बातों में आने वाले नहीं थे। वे संसार की तत्कालीन वास्तविकता को जानते और समझते थे। वो शांति और अहिंसा की स्थापना के पीछे छिपे ताकत के बल को समझते थे इसलिए वे शक्ति की उपासना के कायल थे। इसीलिए उन्होंने संसद में अपने भाषण में कट्टरवादियों को ललकारा था कि अब फिर से अलगाववादी विशेषाधिकारों का राग अलापना बंद कर दो। पंडित नेहरू को जीवित रहते ही सरदार ने चीन के नापाक इरादों से सावधान कर सैन्य शक्ति के सुसंगठन पर ध्यान देने को कहा था।


देश की दुर्दशा को हर मोर्चे पर दूर करने का उनका सपना था। जसवंत सिंह, आप और आपकी तत्कालीन सरकार तो राम का नाम लेकर सत्ता में जा पहुंची, लेकिन अयोध्या में एक इंच जमीन भी आप राममंदिर के नाम पर हिंदुओं को दिला न सके। और तो और जो जमीन रामजन्मभूमि न्यास की थी, जो अविवादित भूमि थी जिस पर कोई विवाद नहीं था, जिस पर निर्माण प्रारंभ करने देने में मुसलमानों को भी कभी कोई आपत्ति नहीं रही, आपके और आपके सहयोगी मंत्रियों की कारस्तानी ने उस भूमि को भी विवादित बना दिया और न्यायालय ने उस पर भी निर्माण से रोक लगा दी।


लेकिन इसके विपरीत सरदार के जीवन पर एक निगाह डालिए और अपने पूर्व मित्र श्री आडवाणी से भी कहिए कि सरदार पटेल के जीवन के पन्नों को फिर से पलट लें कि कैसे बिना कोई विवाद खड़ा किए, हिंदुस्तान की प्राचीन धरोहर का पुनर्निर्माण किया जाता है। सिंधु सागर के तट पर खड़े होकर सरदार पटेल ने कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी के साथ शपथ ली थी कि हे soomnaath! bharat ke kan kan me, saans saans me samaye he anaadi shankar! अब भारत आजाद हो चुका है, भारत कभी मिट्टी में नहीं मिलेगा उसी तरह जैसे तुम अपने ही खण्डहरों से पुन: उठ खड़े होने जा रहे हो, वैसे ही ये देश दासता की भयानक काली रात के सन्नाटे से निकल कर उगते सूर्य की उषा किरण में तुम्हें जलांजलि dene के लिए उठ खड़ा हो रहा है। ये देश अमर है, इसकी संस्कृति अमर है, इसका विश्‍व मानवता के लिए संदेश अमर है-सर्वे भवन्तु: सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।


ये सरदार थे jinhone विदेशी आक्रमणों की आंधी में उध्वस्त हो गए द्वादश ज्यातिर्लिंगों में एक सोमनाथ मंदिर की फिर से प्राण प्रतिष्‍ठा की। मानों 11 वीं सदी में हिंदुस्तान को गुलाम बनाने के लिए एक के बाद एक भयानक हमलों का जो सिलसिला सोमनाथ को ध्वस्त कर प्रारंभ किया गया था सरदार ने उसी मंदिर के शिलान्यास से दुनिया में भारत विजय के अभियान का श्रीगणेश किया था।
जसवंत सिंह! सरदार के जीवन के ये पन्ने आप क्यों नहीं पढ़ सके? शेष अगले अंक में……
-राकेश उपाध्‍याय

Saturday, September 5, 2009

अभी भगीरथ जिन्दा हैं, नचिकेता शेष हैं

उम्र से बड़प्पन नहीं आता
दिमाग से भी नहीं,
ये दिल का सवाल है भाई
दिल बड़ा है तो
आदमी भी बड़ा हो जाता
है।

जगत में आए हो तो
कुछ ऐसा कर जाओ कि
आने वाली नस्लें तुम्हें
सम्मान से याद करें, जब
तुम मिलो अपने चाहने वालों से
तो तुम्हारी आँखें ना झुकें


यदि कहीं तुम उंचे उठ जाओ
भाई ना किसी को सताओ,
अनुशासन के कोड़े की अपनी मर्यादा
कुछ काम प्रेम से भी


इस बात को ठीक समझ लो
कि विचार पर आघात या
फिर संवाद में करना विवाद
या किसी की कलम तोड़ देना
अभिव्‍यक्ति पर जुल्‍म ढाना है,
इससे तो महानता
नहीं ही मिलेगी
इससे बड़ी हरकत
नहीं हो सकती है कायराना।


दम है तो लेखन में आओ
संवाद की दम रखो
और आजमाओ, पता चल जाएगा
कि पानी कितना है
पद का अभिमान मत पालो
कल तो है ही इसको जाना॥


बड़े बड़े रावण और कंस
जानते हो क्यों मारे गए?
क्‍योंकि उन्हें उनके अहं
ने गुमान से इतना भर दिया
कि उन्हें दिखना बंद हो गया
कि सच क्या है? व्यक्ति का विचार
क्या है, किस धरातल पर खड़ा है।


प्रतिभा है तो पराजय कहां
परिश्रम है तो थकना भी क्या,
सरिता है तो रूकेगी नहीं
सागर है तो नदी का क्‍या।


सबको समाहित कर ले जो
चलाए सही राह पर
उसे ही महान मानो,
दूसरों की त्रुटियां गिना कर
अपनी जगह बनाए जो
उसे तो हैवान जानो।
डाह, ईर्ष्‍या से कभी कोई
क्या महान बन सका है?
पीड़ित मानवता को क्या
ऐसा आदमी सुख दे सका है?
ये तो निरी नीचता है,
समाज के संघर्ष पर जो
सुख भोगने की सोचते हैं
अपना कुछ किया धरा नहीं
काम निकला नहीं कि
जगत से मुंह मोड़ते हैं।
बताओ भला! कैसे गिरे इंसान हैं
शर्म को बेचकर पी गए
भाइयों के जीवित रहते ही
उनकी कमाई को लीलते हैं।


अरे कुछ तो धर्म सीखें,
इतने कृतघ्न ना बनें,
दम है तो अखाड़े में लड़ें
अकेले ही धुरंधर ना बनें।


पर हे प्रभु!
हम ये गलती कभी ना करें
हम अभिमान छोड़ दें,
ये झूठी शान छोड़ दें
क्योंकि कलियुग है फिर भी
दया का, धर्म का, सत्य का
अभी राज्य मरा नहीं है
अभी भगीरथ जिंदा हैं,
अभी नचिकेता शेष हैं।


अग्नि की लपट उठे
सारा करकट जल मिटे
इसके पहले ही अपना कर्कट
भी अग्नि को अर्पित कर दो
और तब संभलकर होलिका के
चारों ओर
घूम-घूमकर परिक्रमा करो,
नहीं तो झुलसने का खतरा है
इसी में आशीष है, यही परंपरा है।

Wednesday, September 2, 2009

छंटे तिमिर, खिले तो उपवन

उठे जलजला जले जरा फूटे यौवन
छंटे तिमिर तरे जन खिले तो उपवन।
मन कानन में बाजे बंशी़, भोरे रे
गाय रंभाती,हमें बुलाती, दुह ले रे
यह सूर्य किरण, चमके घर~आंगन
भाग्य जगा है सुन~सुन तो ले रे।
उठे जलजला जले जरा फूटे यौवन
छंटे तिमिर तरे जन खिले तो उपवन।

इक आग जल रही है

इक आग जल रही है
ह्रदय में, ह्रदय मैं
निगलने को आतुर
मिलने को आतुर
उससे जो आग जल
रही है सबमें, रब में
इक आग जल रही है।

मुझको मालूम है
क्या तुमको मालूम है
कण कण में जो छिपी है
पैदायशी जो सबको मिली है
वो तुममे भी है
वो मुझमे भी है ,
वो आग तुममें भी
जल रही है ।
आओ जाने थोड़ा विचारें
अन्याय के सारे ठिकाने
इस आग में जला दें
मिला दें राख में
जो बन गए हैं शोषण के पुतले ॥

इक आग जल रही है।

Thursday, August 27, 2009

जसवंत सिंह! ये देश के साथ बौद्धिक गद्दारी है

जसवंत सिंह राजनीति में किस करवट बैठेंगे ये तो भविष्य ही बताएगा लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर खुद को एक बड़ी आपदा से बचा लिया। वास्तव में जिन्ना आधारित पुस्तक में जसवंत ने जिन्ना के पक्ष में जो प्रेमालाप किया है आगे चलकर उसके दुष्परिणाम देश और राष्ट्रवादी राजनीति को झेलने ही होंगे। पहले से ही संभ्रमों में उलझा हुआ भारतीय समाज अब और गहरे संभ्रमों का शिकार हो जाएगा।

जसवंत सिंह ने जिन्ना की प्रशंसा करने और देश के अन्य प्रमुख नेताओं की खाल उधेड़ने में पूरी चतुराई और मासूमियत का परिचय दिया है। भारत के विभाजन की बात करते करते कब वे देश विरोधी बातें करने लगते हैं यदि बारीकी से न पढ़ा जाय तो इसका पता भी नहीं चलता है। जाहिर है नई पीढ़ी के मन में उन्होंने अपने ही राष्ट्रीय नेतृत्व के खिलाफ घृणा का भाव भरने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है।

ऐसा नहीं है कि पूरी पुस्तक में जसवंत ने सब गलत ही गलत लिखा है। अधिकांशत: तो वे ऐसा बताते प्रतीत होते हैं कि वे अखण्ड भारत ke samarthak hain और विभाजन विरोधी लाइन पर आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन अपने देशभक्तिपूर्ण लंबे-लंबे आख्यानों, उध्दरणों के बीच बीच वे जिस प्रकार से जिन्ना की प्रशंसा और हिंदू नेताओं की खामियों को गूंथते गए हैं, उसी से पता चलता है कि उनके मन की ग्रंथि कितनी भयावह है। जिन्ना प्रेम के अतिरेक की रौ में गांधी, नेहरू और सरदार पटेल समेत पूरी हिंदू नेतृत्व परंपरा को ही जसवंत ने विभाजन का दोषी ठहरा दिया है।

पुस्तक के द्वितीय अध्याय में जसवंत ने ये सिध्द करने का प्रयास किया है कि भारत की राजनीति में मुसलमानों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता आया है। जिन्ना भी उसी दोयम दर्जे के व्यवहार के शिकार हुए और मुख्यधारा की राजनीति से अलग फेंक दिए गए। जसवंत के अनुसार,’ या तो नियति को कुछ और मंजूर था? या जिन्ना ही चतुराई नहीं दिखा सके? या और भी दु:खद रूप से कहा जाए तो क्या मुसलमान होना ही जिन्ना के लिए शुरू से नुकसानदेह साबित हुआ? राजनीतिक प्रभुता प्राप्त करने की निष्ठुर दौड़ में जिन्ना ताजिंदगी इस भारी विकलांगता को ढोते रहे।’

क्या जसवंत सिंह कहना चाह रहे हैं कि मुसलमान होना ही भारतीय राजनीति में जिन्ना का गुनाह हो गया? ये आरोप लगाकर जसवंत क्या सिध्द करना चाह रहे हैं? जरा सोचिए कि जिन्ना को राजनीति की डगर पर आगे लाने वाले कौन थे? लोकमान्य तिलक, दादा भाई नरौजी, फिरोजशाह मेहता, गोपाल कृश्ण गोखले, आखिर इसमें से कौन मुसलमान था? आगे चलकर भारतीय राजनीति में जो राष्ट्रवादी मुस्लिम नेतृत्व आया जिसमें अबुल कलाम आजाद, जफर अली, हसरत मोहानी, शिबली नोमानी, हकीम अजमल खां, खां अब्दुल गफ्फार खां, डा. एम.ए. अन्सारी, रफी अहमद किदवई आदि के जीवन में क्या मुसलमान होना विकलांगता थी? जसवंत ने तो हिंदुओं किंवा भारतीयों की समग्र सहिष्णु परंपरा को यहां एक लाइन में दांव पर लगा दिया। वह परंपरा जिसने अंग्रेजों के खिलाफ प्रथम स्वातंत्र्य समर में निर्विरोध बहादुर शाह जफर को अपना सम्राट घोषित कर दिया था।

धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर अपने विचार प्रकट करते हुए जसवंत सिंह अध्याय 5 में कहते हैं- ‘धर्म तो रिलिजन का सही अनुवाद बिल्कुल भी नहीं है। कुछ ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि जो धर्मनिरपेक्षतावाद पश्चिम से अब आया है वह तो एक जीवंत दार्शनिक परंपरा के रूप में भारत में बहुत पहले से ही मौजूद है। इस कई हजार साल पीछे लौटने में क्या यह भाव भी अन्तर्निहित नहीं है कि सांप्रदायिकता के लिए मुस्लिम समुदाय ही जिम्मेदार ठहराया जाता था और आज भी ठहराया जा रहा है?’

बहुत बारीकी से इसे देखें तो ध्यान में आएगा कि जसवंत वास्तव में क्या कह रहे हैं। उनके कहने का अभिप्राय यही है कि हिंदुओं द्वारा धर्मनिरपेक्षता को अपनी जीवन पंरपरा से जोड़कर बताने का परिणाम ये है कि मुसलमान सांप्रदायिकता के लिए दोषी ठहरा दिए गए।

आगे बढ़ने के पूर्व पिछली कड़ी में उल्लिखित कुछ बातों का पुर्नस्मरण आवश्यक है। अपनी पुस्तक के अंग्रेजी संस्करण के अध्याय दो के पृष्ठ क्रमांक 102 पर जसवंत सिंह उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में गांधीजी को ‘रिलीजियसली प्राविन्सियल’ बताते हैं तो वहीं पर जिन्ना को ‘सैध्दांतिक रूप से धर्मनिरपेक्ष एवं राष्‍ट्रवादी उत्साह से लबरेज राजनीतिज्ञ’ की संज्ञा देते हैं।

मैंने ‘रिलीजियसली प्रॉविन्सियल’ का अनुवाद ‘पांथिक या धार्मिक भाव-भावना से युक्त प्रांतीय’ स्तर के नेता के रूप में लिया है। वैसे शब्दकोश में ‘प्रॉविन्सियल’ के मायने ‘संकीर्ण’ और ‘गंवार’ भी है। जसवंत आखिर गांधी को क्या कहना चाहते हैं ये तो ठीक से वे खुद ही बता सकते हैं। मेरे इस कथन के पीछे का कारण भी वाजिब है। मेरे द्वारा लिखी जा रही जिन्ना सीरीज़ को पढ़कर एक सज्जन ने मुझसे कहा-आप तो जसवंत को गलत उध्दृत कर रहे हैं। मैंने कहा कि कहां गलत उध्दृत किया है, मुझे बताइए? तो उन्होंनें तुरंत बता दिया कि उनकी पुस्तक के हिंदी संस्करण में कहीं भी ये मुद्दा नहीं आया है कि गांधी 1920 के शुरूआती दौर में एक ‘प्रादेशिक भाव भावना’ वाले नेता थे। मैं चकरा गया और मैंने फिर अंग्रेजी संस्करण का वाक्य उन्हें पढ़कर सुनाया तो वे भी चकरा गए कि ‘रिलीजियसली प्रॉविन्सियल’ का अनुवाद हिंदी में गलत क्यों कर दिया गया है? हिंदी संस्करण में लिखा है-’ द्वितीय विश्वयुध्द के आते आते गांधी का दृष्टिकोण और नीति पूरी तरह बदल चुकी थी। इन दिनों गांधी के नेतृत्व में लगभग पूरी तरह एक ‘धार्मिक और सही रोल व स्थान को तलाशते चरित्र’ के दर्शन होते हैं वहीं दूसरी ओर जिन्ना निस्संदेह एक सैध्दांतिक पंथनिरपेक्ष व राष्ट्रवादी उत्साह से भरपूर राजनीतिज्ञ की तरह उतरते हैं।’ अब इस अनूदित हिंदी पैरे की अंग्रेजी जो निष्चित रूप से जसवंत सिंह ने लिखी है, उसे पढ़ा जाए- “In any event, Gandhi’s leadership at this time had almost an entirely religiously provincial character, Jinnah, on the other hand was then doubtless imbued by a non sectarian, nationalistic zeal.” (p.102)

अब पाठकगण ही तय करें कि उपरोक्त अंग्रेजी वाक्य का सही अनुवाद क्या होगा? मुझे जो सही लगा और जो सही है उसे मैंने अंग्रेजी संस्करण से अपनी भाषा में अनूदित कर लिया लेकिन जसवंत सिंह द्वारा अधिकृत हिंदी संस्करण में क्या लिखा है उस पर मैं क्या टिप्पणी कर सकता हूं। जब ये गलती ध्यान में आई तो मैं अंग्रेजी संस्करण लगभग पूरा पढ़ चुका था और दूसरी किश्त वेब पर पोस्ट हो चुकी थी। लेकिन बाद में मैंने पुस्तक के हिंदी संस्करण को जब ध्यान से पढ़ना शुरू किया तो ध्यान में आया कि इसमें तो गजब गड़बड़-झाला किया गया है, अनेक स्थानों पर वाक्य भ्रम भी पैदा करते हैं। अतएव हिंदी संस्करण के पाठकों को बहुत ही सावधानी से पुस्तक पढ़नी चाहिए। जसवंत सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सम्बंधी जो लघु टिप्पणी अंग्रेजी पुस्तक में लिखी है वह तो पूरी की पूरी ही हिंदी संस्करण से गायब कर दी गई है। आखिर ये क्यों किया गया, उस पर बाद में प्रकाश डालेंगे।

पुन: जसवंत सिंह लिखते हैं कि ‘मुंबई में आयोजित स्वागत समारोह में जिन्ना ने जहां गांधी की पुरजोर प्रशंसा की वहीं गांधी की प्रतिक्रिया अपमानजनक और हतोत्साहित करने वाली थी।’

जसवंत सिंह जिन्ना की प्रशंसा और गांधीजी की आलोचना का कोई मौका चूकते हुए दिखाई नहीं देते। एक कुशल क्रिकेट कमेंटेटर की भांति लेखकीय निष्पक्षता दरकिनार करते हुए जिन्ना के पक्ष में और राष्‍ट्रीय नेताओं के खिलाफ कमेंट्री की है।
जसवंत सिंह को 1920 के दशक में जिन्ना की मुस्लिम लीग में सक्रियता दिखाई नहीं देती है। उल्लेखनीय है कि जिन्ना अनौपचारिक रूप से सन् 1911 में और औपचारिक रूप में 1913 में मुस्लिम लीग के विधिवत सदस्य हो गए थे। पाठकगण ध्यान रखें कि इस अवधि में भारतीय राजनीति में गांधी, नेहरू और पटेल कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। कांग्रेस की राजनीति की कमान गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता जैसे उदारपंथियों के हाथ में है जबकि पूर्ण स्वराज्य के प्रखर समर्थक लोकमान्य तिलक 1908 से 1914 तक माण्डले जेल के कैदी के रूप में जीवनयापन कर रहे हैं।

ये उदारपंथी नेता जिनकी करनी के बारे में तिलक सीरीज में हमने काफी कुछ लिखा था, आखिर उस कालखण्ड में कर क्या रहे थे? कहना गलत न होगा कि वे दिन में संवैधानिक सुधार पर संगोश्ठी करते थे तो रात में अंग्रेज अफसरों की दावतें काटते थे। औपनिवेशिक आजादी के सवाल पर मंथन चलता था और उसी में कुछ प्रगतिशील जिन्ना पंथी नेता कम वकील भी शामिल रहते थे। घुमा-फिराकर अंग्रेज इसी सवाल को उठाते थे कि हम भारत को औपनिवेशिक आजादी दे देंगे, डोमिनियन स्टेटस दे देंगे लेकिन भारत के नेताओं को इसमें अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी के संदर्भ में पहले स्पष्ट निर्णय कर लेना चाहिए।

पूर्ण स्वराज्य का सवाल तो बहुत बाद में आता है। लोकमान्य तिलक का हश्र देखकर भी भारतीय नेता ब्रिटिश सरकार का कोपभाजन नहीं बनना चाहते थे।

दरअसल हकीकत तो ये थी कि उस समय अंग्रेजों से प्रेमपींगे बढ़ाने के प्रयास अक्सर हिंदुस्तान के संभ्रांत वर्ग में चला करते थे। अंग्रेजों से सम्बंध और अंग्रेजी में महारत ये दो ऐसे गुण थे जिससे किसी बैरिस्टर की बैरिस्टरी हिंदुस्तान क्या दूर सागर पार लंदन में भी चल निकलती थी। अंग्रेजों से सम्बंध के लिए जरूरी था कि कांग्रेस या फिर किसी ऐसे संगठन का कमान अपने हाथ में ले ली जाए ताकि अपना प्रभाव बना रहे और वकालत भी हाथ की हाथ चमकती रहे।

लोकमान्य तिलक ने कांग्रेस में इसी का विरोध प्रारंभ किया था, परिणामत: उनकी नरमपंथियों से ठन गई। बंग-भंग में लाल-बाल-पाल ने जो जनज्वार देश में खड़ा किया उसके परिणाम स्वरूप नरमपंथी भी संशकित हुए और अंग्रेज सरकार भी। धूर्त और चालाक अंग्रेजों ने तभी ढाका में मुर्स्लिम लीग की नींव रखवा दी थी क्योंकि वो जानते थे कि भारतीय मानस धर्म-जाति की दीवारें तोड़कर उनके खिलाफ एकजुट हो रहा है। इस एकजुटता को तोड़ने के लिए देश में ‘हिंदू सांप्रदायिकता’ का झूठा हौव्वा खड़ा किया गया। अंग्रेजों ने अल्पसंख्यकवाद और उससे जुड़ी विभाजनकारी प्रवृत्तियों को मुस्लिम लीग के माध्यम से देश में गहरे स्थापित कर देने का अभियान शुरू किया। राष्ट्रवादियों के प्रबल प्रताप से ‘बंग-भंग’ तो मिट गया लेकिन ‘भारत-भंग’ की योजना पर चोट खाए ‘लंदन’ ने काम शुरू कर दिया। और इसी योजना को पूर्ण करने के काम में ‘विभीषण’ बने थे मोहम्मद अली जिन्ना।

मोहम्मद अली जिन्ना अपनी राजनीति के प्रारंभ से कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अपने साथियों के साथ माथापच्ची में लगे थे कि इस कथित औपनिवेशिक आजादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी क्या होगी? इस एक सवाल के अतिरिक्त कौन सा मुद्दा है जिसे जिन्ना ने अपने उस समय के राजनीतिक जीवन में स्पर्श किया? आप कलम चाहे कितनी ही क्यों ने घिस लें आप एक प्रमाण नहीं दे सकते कि जिन्ना ने बंग-भंग के ‘वातानुकूलित विरोध’ के अतिरिक्त 1901 से लेकर 1920 तक एक भी ब्रिटिश विरोधी आंदोलन में हिस्सा लिया हो या फिर किसी आंदोलन का श्रीगणेश किया हो? जिस लखनऊ समझौते के लिए जिन्ना की प्रशंसा की गई है, प्रकारांतर से देखें तो वह भी देश में मुस्लिमों के तुश्टीकरण का एक अप्रत्यक्ष प्रयास था जिसमें मुस्लिम नेताओं ने कांग्रेस से सौदेबाजी कर ये तय कराया कि विधायिका और कार्यपालिका में दो तिहाई सदस्य हिंदू और एक तिहाई सदस्य मुसलमान रहेंगे। इसी के साथ इस बात पर भी सैध्दांतिक सहमति बना ली गई कि मुसमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल गठित किये जाएंगे।

जसवंत सिंह ने पुस्तक में ‘डोमिनियन स्टेटस’ और ‘पूर्ण स्वराज्य’ की भी गजब परिभाषा दी है। अध्याय 4 में वे लिखते हैं कि ‘गांधी और नेहरू में ‘डोमिनियन स्टेटस’ और ‘पूर्ण स्वराज्य’ के सवाल पर तीखे मतभेद खड़े हो गए। गांधी जहां ‘डोमिनियन स्टेटस’ की वकालत कर रहे थे वहीं नेहरू ‘पूर्ण स्वराज्य’ की। ये विवाद 1927 के कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में सामने आया और….इसको लेकर दो साल तक दोनों में मतभिन्नता बनी रही। सन् 1929 में जब नेहरू लाहौर कांग्रेस के अध्यक्ष बने तब जाकर ये विवाद सुलझा और कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना राजनीतिक लक्ष्य तय कर लिया।’

पुन: आगे बिना किसी उध्दरण के जसवंत सिंह अपनी बेबाक राय रखते हैं-भले ही दोनों नेताओं का लक्ष्य आजादी ही पाना था लेकिन दोनों अलग-अलग तरह की उम्मीद जगाते थे और उनकी प्रतिबध्दताएं भिन्न थीं। डोमिनियन दर्जे का मतलब था कि ब्रिटिश ताज के साथ जुड़े रहना, राजशाही से जुड़ी तमाम संस्थाओं में शामिल रहना…डोमिनियन दर्जे का एक मतलब यह भी था कि भारत में सत्ता हस्तांतरण किस तरह और किन शर्तों पर होगा इसको लेकर भी मोलभाव होगा। ब्रिटिश सरकार इस बात पर जोर देती थी कि अल्पसंख्यकों के अधिकार सुनिष्चित किए जाएं और उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो…। दूसरी ओर पूर्ण स्वराज का मतलब था कि ब्रिटिश राजशाही का विरोध, एकल राष्ट्रवाद…राजनीतिक तौर पर उठा-पटक…जो आगे चलकर गठित होने वाली सरकार की बागडोर राष्ट्रवादी लोगों के हाथ में सौंप देती। पूर्ण स्वराज का मतलब यह भी था कि नयी बनने वाली सरकार में अल्पसंख्यकों की सत्ता में भागीदारी की उम्मीद नहीं होगी।’

तालियां! तालियां! वाह क्या थ्यौरी प्रतिपादित की है जसवंत सिंह ने। चूंकि यहां उन्होंने किसी को उध्दृत नहीं किया है इसलिए कहा जा सकता है कि ये उनके अपने विचार हैं। अक्सर आजकल क्या होता है कि लोग विवाद से बचने के लिए अपने मनमाफिक बात कहने के लिए किसी दूसरे का उध्दरण उठा लेते हैं, अपनी बात भी कह देते हैं और किसी विवाद से बचने की पूरी संभावना बनाए रखते हैं कि ये तो फलां ने कहा था, मैंने तो सिर्फ उन्हें उध्दृत किया है। लेकिन यहां जसवंत ने किसी को उध्दृत नहीं किया है। डॉमिनियन स्टेटस और पूर्ण स्वराज्य के सम्बंध में ये संभ्रम भी उन्हीं अंग्रेजों और तिलक विरोधी खेमे की देन थी जिन्होंने डॉमिनियन स्टेटस का विरोध करने और पूर्ण स्वराज का पक्ष लेने के लिए तिलक को राजद्रोह के मुकदमें में जेल भेजवाया था।

जसवंत सिंह ने पूर्ण स्वराज को परिभाषित कर जाहिर कर दिया कि उन्हें भारत की महान विरासत के प्रति कितना गहन ज्ञान है? उन्होंने अपनी परिभाषा में अंग्रेजों के इस मत की पुष्टि भी कर दी कि अगर पूर्ण स्वराज्य दे दिया जाता जैसा कि तिलक मांग रहे थे तो देश में हिंदू राज आ जाता और अल्पसंख्यकों अर्थात मुसलमानों की नींद हराम हो जाती।
आखिर किस आधार पर जसवंत कह रहे हैं कि पूर्ण स्वराज का मतलब ये है कि अल्पसंख्यक सत्ता से बेदखल कर दिए जाएंगे। अरे! ये तो अंग्रेजों की गढ़ा हुआ तर्क था जिसे देश की आजादी को दो संप्रदायों की लड़ाई में उलझाने के लिए परवान चढ़ाया गया। जिसके आधार पर गांधी, नेहरू, पटेल सहित समूची कांग्रेस को जिन्ना और उनके अनुयायियों ने हिंदू पार्टी और सांप्रदायिक घोषित कर दिया। आखिर जसवंत सिंह जैसे एक राजनीतिज्ञ को ये समझने में भूल कैसे हो सकती है कि अल्पसंख्यक शब्द का वजूद भी हिंदुस्तान की राजनीति में 1857 तक नहीं था। सन् 57 की क्रांति की असफलता के बाद अचानक भारत में अल्पसंख्यक अवधारणा कहां से आ गई? इसे लाने वाले कौन थे? किसने इसे भारत में सींचने का काम किया? और इसके पीछे की उनकी सोच क्या थी?

आखिर देश के मुसलमानों को ये समझने और समझाने में क्या दिक्कत हो सकती थी कि जिस देश पर गोरी, गजनवी, खिलजी, गुलाम, तुर्क, अफगान और मुगलिया सल्तनत समेत अनेक वंशों ने शताब्दियों तक राज किया उसे कुछ समय तक हिंदू राज के केंद्र के अन्तर्गत क्यों नहीं लाया जा सकता? आखिर हिंदू इस देश में राजा क्यों नहीं बन सकता? ये देखने की चीज होती और निष्चित रूप से दुनिया देखती कि जो हिंदुस्तान सदियों तक इस्लामी हुकूमत में रहा, जहां कुछ सैकड़ा साल अंग्रेजी शासन रहा वहां हिंदू किस प्रकार से सभी को साथ लेकर शासन चला पाते हैं? शायद अगर इस तर्क को जिन्ना जैसे लोग बहस का मुद्दा बनाते तो भारत राष्ट्र का भवितव्य कुछ और होता।

नियति ने वास्तव में जो सपना इस महान भूमि के लिए निर्धारित किया है और जिसे पाना ही इस धरती का महान भविश्य भी है उसी के साक्षात्कार के लिए गांधी ने रामराज्य का प्रेरक मंत्र देश को दिया था। दुर्भाग्य कि जिन्ना जैसों की मानसिकता को समझने में गांधी-नेहरू ने देर कर दी। कांग्रेस अहिंसा की माला जन- जन के गले में उतार रही थी उधर जिन्ना लाखों लोगों का खूं पीकर सत्ता पाने के लिए मतवाला हो चला था। वह तो सर्वधर्म समभाव को लेकर चल रहे हिंदू नेतृत्व के बारे में प्रतिहिंसा की भयानक आग दिल में बिठाए मानो दशकों से धधक रहा था।

प्रख्यात मुस्लिम विचारक, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रफीक जकारिया अपनी सुप्रसिध्द पुस्तक ‘इंडियन मुस्लिम्स: व्हीअर दे हैव गोन राँग’ में ‘जिन्ना की जिद’ नामक अध्याय में लिखते हैं-’मुझे हमेशा ये संदेह रहा कि जिन्ना कांग्रेस के साथ किसी समझौते पर कभी राजी नहीं होगा। उसकी प्रवृत्ति प्रतिहिंसा प्रधान है। भारतीय राजनीति में लंबे समय तक दरकिनार रखे जाने के खिलाफ वह गांधीजी को पाठ पढ़ाना चाहता है।…देश के दो टुकड़े करो और मुझे मेरा पाकिस्तान दे दो, यही उसका प्रिय गीत है। मेरी तो कांग्रेस से यही विनती है कि गृहयुध्द हो जाने दो मगर इस आदमी के हाथों में देश गिरवी मत रखो। एक मुसलमान के नाते मैं मानता हूं कि उसने मुसलमानों का भविष्य तबाह किया। उसके नेतृत्व में फासीवाद झलकता है जिससे हर कीमत पर लड़ा जाना चाहिए।

जसवंत सिंह को ये दिखाई नहीं देता कि जिन्ना के समकालीनों ने उसके बारे में क्या विचार प्रकट किए हैं। खुद जिन्ना ने किस संदर्भ में क्या बात कही है। बैसिरपैर की बातें, ‘कहीं की ईंट और कहीं का रोड़ा-भानुमति ने कुनबा जोड़ा’ को चरितार्थ करते हुए जसवंत सिंह ने उध्दरणों का अनर्थकारी इस्तेमाल किया है। उदाहरण के लिए-पाकिस्तान की संविधान सभा में 11 अगस्त, 1947 को जो कथित सेकुलर भाषण जिन्ना ने दिया उसकी असलियत सुविज्ञ को पाठकों को पिछली कड़ी में पता लग चुकी है। एक अन्य उध्दरण जो गांधीजी की ओर से जसवंत सिंह ने पुस्तक के अध्याय 11 में उध्दृत किया है जरा उसकी सच्चाई भी देखते हैं-’जिन्ना ने घोषणा की कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों से, यदि संभव हुआ तो, मुसलमानों से भी बेहतर तरीके से पेश आया जाएगा। कोई भी कम हक वाला या अधिक हक वाला प्रतियोगी नहीं होगा।’ जसवंत सिंह ने धीरे से ये बात गांधीजी के हवाले से पुस्तक में प्रविष्ट करा दी। वे चाहते तो इसे जिन्ना के हवाले से भी उध्दृत कर सकते थे लेकिन ऐसा करने में उन्हें जरूर उस खतरे का भान रहा होगा जो उनकी सारी जिन्ना थीसिस को ही सिर के बल खड़ा कर देने में अकेले सक्षम है।

पाठक मित्रों! जिन्ना का ये वक्तव्य जो भी पढ़ेगा क्या उसके मन में जिन्ना के प्रति प्यार नहीं उमड़ेगा। लेकिन आप अब इसकी असलियत भी देख लीजिए। ये वक्तव्य जिन्ना ने कब दिया? ये वक्तव्य तब आया जब जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग, उसके अन्तर्गत गठित नेशनल गार्डस के हथियारबंद दस्ते ‘सीधी कार्रवाई’ के नाम पर 16 अगस्त, 1946 से रक्तपात का दौर शुरू कर चुके थे। कोलकाता, नोआखली चारों ओर लीगी गुण्डों ने ऐसा जलजला पैदा किया कि मानवता तक शर्मा गई। क्यों किया ऐसा जिन्ना ने? क्योंकि उसे हर कीमत पर पाकिस्तान चाहिए था? लेकिन जैसा कि हर क्रिया के विरूध्द प्रतिक्रिया होती ही है, लीगी गुण्डों के इस बर्ताव ने समूचे हिंदू जनमानस में तीव्र क्षोभ पैदा कर दिया। प्रतिक्रिया में उत्तर प्रदेश और बिहार में हिंदुओं ने लीगी मुसलमानों से मोर्चा ले लिया। और तब जो आग भड़की उससे जिन्ना और उनकी पूरी लीगी मंडली के होश फाख्ता हो गए।

लीग की सीधी कार्रवाई की प्रतिक्रिया में जो दंगे भड़के उस पर ब्रिटिश लेखक सर फ्रांसिस टकर अपनी पुस्तक व्हाइल मेमोरी सर्वस् में लिखते हैं-’1946 के दंगों में बिहार का दंगा सबसे ज्यादा भयावह सिध्द हुआ। लगभग 8 हजार मुसलमान मौत के घाट उतार दिए गए। मुस्लिम लीग ने जो रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को सौंपी उसमें मृतकों की संख्या 20,000 से 30,000 तक बताई गई। यद्यपि ये संख्या बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की गई लेकिन इसके बावजूद जो नरसंहार हुआ उसकी मिसाल मिलना कठिन है।’ और ये मारकाट केवल बिहार तक ही सीमित नहीं थी, इसकी उत्तर प्रदेश, पंजाब समेत समूचे देश में फैल रही थीं।

लीग को अपने ‘डायरेक्ट एक्शन’ का परिणाम भीषण हिंदू प्रतिक्रिया के रूप में मिलना शुरू हो चुका था। दंगे रूकने का नाम नहीं ले रहे थे। शुरू में लीगी मुसलमान मार-काट में आगे थे लेकिन आगे चलकर उनकी हालत खराब हो गई। इस विकट परिस्थिति में मोहम्मद अली जिन्ना को दिन में तारे दिखने लगे। तब उन्होंने 11 नवंबर, 1946 को देश के नाम अपील जारी की और हिंदुओं से प्रार्थना की कि वे ये भयानक मार-काट बंद कर दें।

जिन्ना ने अपने वक्तव्य में कहा- ‘ये गलत बयानी की जा रही है कि जो मार-काट मची है उसके लिए लीग जिम्मेदार है। मुस्लिम लीग पर लगाए जा रहे बर्बर और गलत आरोपों का कोई आधार नहीं है। लेकिन ये समय इस पर बहस का नहीं है कि कौन गलत है और कौन सही। मैं जानता हूं कि मुसलमान भारी कष्ट और विपदा में हैं। लेकिन बिहार की हिंसा तो मुसलमानों पर ग्रहण बनकर टूटी है। मैं हिंसा की घोर निंदा करता हूं चाहे वह किसी रूप में क्यों न की जाए। बिहार की हिंसा के समान मुसलमानों के संहार का दूसरा उदाहरण नहीं है जो बहुसंख्यक हिंदुओं ने अल्पसंख्यक मुसलमानों पर ढाया है।

…अगर हम पाकिस्तान चाहते हैं तो मुसलमानों को बिहार जैसी किसी भी हिंसक प्रतिहिंसा से दूर रहना चाहिए। यद्यपि हमारे ह्दय लहूलुहान हैं तो भी जहां मुसलमान बहुसंख्यक हैं वहां उन्हें निर्दोषों के कायरतापूर्ण नरसंहार से अपने को अलग रखना होगा।

अगर हम अपना संतुलन और धैर्य खो देंगे… तो न सिर्फ पाकिस्तान हमारे हाथ से निकल जाएगा वरन् रक्तपात और क्रूरता का ऐसा दुश्चक्र प्रारंभ हो जाएगा जो मुसलमानों की आजादी को न सिर्फ अवरूध्द करेगा वरन् हमारी दासता और बंधनों को और लंबे काल तक के लिए आगे धकेल देगा।

हमें राजनीतिक रूप से ये सिध्द करना है कि हम बहादुर हैं, उदार हैं, विश्वसनीय हैं… कि हमारे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को उनके जान-माल और इज्जत की सुरक्षा की पूरी गारंटी होगी जैसे कि मुसलमानों के लिए- नहीं, नहीं मुसलमानों से भी ज्यादा सुरक्षा बख्शी जाएगी।…इसलिए मेरी मुसलमानों से अपील है कि वे जहां जहां बहुमत में हैं वहां वहां अल्पसंख्यक गैर मुस्लिमों की हिफाजत का पूरा प्रबंध करें।…

अंत में जिन्ना कहते हैं- मुसलमानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। ये बलिदान पाकिस्तान के हमारे दावे को और मजबूती देगा।

तो ये है सच्चाई जसवंत सिंह जी। जब जिन्ना की जान पर बन आई तो उसे प्रेम संदेश गुनगुनाने में दो मिनट नहीं लगे। समूची पुस्तक में जसवंत सिंह ने संदर्भों के साथ इसी तरह मनमाने ढंग से खिलवाड़ किया है। ऐसा लगता है कि उन्होंने जिन्ना के पापों को धो डालने का बीड़ा उठा रखा है। लेकिन उन्हें यह भी समझना चाहिए कि ना तो वे जिन्ना के पाप पक्ष का प्रक्षालन कर सकते हैं और ना ही उसके कुकर्मों का ठीकरा किसी और के सिर पर फोड़ सकते हैं। इतिहास उन्हें इसकी इजाजत कदापि नहीं देगा। वास्तव में तो इतिहास को तथ्यपरक दृष्टि से परखकर उसके परिणामों पर गौर किया जाना चाहिए और तब तय करना चाहिए कि कौन गलत है और कौन सही है।
इसके पहले जब जिन्ना ने सीधी कार्रवाई का ऐलान किया तो तमाम हिंदू नेता उसके पैरों पर गिड़गिड़ा रहे थे कि वह हिंसा और रक्तपात को रोकने के लिए आगे आए। लेकिन जिन्ना ने एक न सुनी। मुस्लिम लीग ने सीधी कार्रवाई सम्बंधी जो प्रस्ताव 29 जुलाई, 1946 को जारी किया उस पर भी एक नजर डालना लाजिमी होगा-

‘जैसा कि मुस्लिम भारत अपनी मांगों के संदर्भ में सभी सुलह-वार्ताओं, संवैधानिक व शांतिपूर्ण तरीकों की असफलता से थक चला है…

जैसा कि कांग्रेस भारत में हिंदूराज स्थापित करने में जुटी है और इस कार्य में उसे ब्रिटिश सरकार का समर्थन हासिल है, और…

जैसा कि भारत के मुसलमान एक पूर्ण संप्रभुता सम्पन्न पाकिस्तान की प्राप्ति और तत्काल स्थापना से कमतर किसी चीज़ पर संतोश नहीं करेंगे।

अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की यह परिशद मानती है कि मुस्लिम राष्ट्र के समक्ष अब पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए ‘सीधी कार्रवाई’ के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। इसी रास्ते से हमें ब्रिटिश गुलामी और हिंदुओं के वर्चस्व से मुक्ति मिल सकती है। इसी से हमारा सम्मान और हमारे अधिकार हमें प्राप्त होंगे।

परिषद मुस्लिम राश्ट्र का आह्वान करती है कि वे सभी अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के झण्डे के नीचे खड़े हों और हर प्रकार के बलिदान के लिए तैयार रहें।

परिषद कार्यकारी समिति को निर्देशित करती है कि वह ‘सीधी कार्रवाई’ का सारा कार्यक्रम तैयार करे और भविष्य के संघर्ष के लिए जहां जैसी जरूरत हो वहां मुसलमानों को संगठित करे। परिषद मुसलमानों का आह्वान करती है कि वह इस सरकार के सभी तमगे और सम्मान उन्हें वापस कर दे।’

डायरेक्ट एक्शन को परिभाषित करते हुए मुस्लिम लीग के सचिव लियाकत अली खां ने सार्वजनिक वक्तव्य दिया कि ‘यदि हमें आजादी तलवार के बल पर ही लेनी है तो हिंदुओं को ध्यान रखना चाहिए कि ये हमारे अतीत को देखते हुए कहीं ज्यादा सस्ता सौदा है।’

जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन को गोल-मोल परिभाषित करते हुए तब अखबारों में जो वक्तव्य दिया था, उस पर भी गौर करना जरूरी है। जिन्ना कहते हैं-’हमने सर्वाधिक एतिहासिक महत्व का निर्णय लिया है। मुस्लिम लीग अब तक केवल संवैधानिक उपायों की बात करती रही है।…लेकिन आज हमने सभी संवैधानिक उपायों को तिलांजलि दे दी है। ब्रिटिश सरकार और हिंदुओं के साथ हमने मोल-तोल बहुत किया लेकिन हमारी वार्ता का कोई परिणाम सामने नहीं आया। वे हमारे सामने पिस्तौल ताने रहे। एक के हाथ में राज्यशक्ति और मशीनगनें थीं तो दूसरे के हाथ में असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन का डण्डा। इसका तो कुछ उत्तर हमें देना ही होगा। हम बताना चाहते हैं कि हमारी जेबों में भी पिस्तौल है।’

संवाददाताओं ने जब जिन्ना से संवैधानिक उपायों को तिलांजलि देने के संदर्भ में पूछा कि क्या वे हिंसा का रास्ता आख्तियार करने जा रहे हैं, जिन्ना ने पलट जवाब दिया- हिंसा और अहिंसा के संदर्भ में वे किसी नैतिक सूक्ष्म भेदों में उलझना नहीं चाहते।

मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त को सीधी कार्रवाई शुरू करने का दिन घोशित किया। लीग के अधीन सिंध और बंगाल सरकार ने 16 अगस्त को सार्वजनिक छुट्टी का दिन घोशित कर दिया। बंगाल के मुख्यमंत्री एच.एस. सुहरावर्दी ने धमकी भरे स्वर में कहा कि यदि केन्द्र में कांग्रेस को सत्ता सौंपी गई तो हम बंगाल को स्वतंत्र देश घोशित कर देंगे।

डायरेक्ट एक्शन डे की इस घोषणा ने समूची कांग्रेस का सकते में डाल दिया। लीग ने किसी भी बातचीत से इंकार कर दिया और फिर जो हुआ उसने मानवता के मुंह पर भयानक कालिख पोत दी।

कोलकाता में 16 अगस्त की सवेरे मुस्लिम लीग के नेतृत्व में जो भयानक विशाल जुलूस निकला, उसमें नारे लगने लगे-’लड़कर लेंगे हिंदुस्तान।’ सार्वजनिक सभा में खुले आम हिंदुओं के विनाश की शपथ ली जाने लगी। और जैसे ही सभा समाप्त हुई, मानो पूरे कलकत्ते मे जलजला आ गया। हत्या, आगजनी और महिलाओं से बलात्कार, लूटपाट को सुहरावर्दी सरकार के संरक्षण में अंजाम दिया गया। मुख्यमंत्री सुहरावर्दी पुलिस नियंत्रण कक्ष से स्वयं दंगों के संचालन में जुटे थे। अंग्रेज गवर्नर एफ बरोज को मानो तो सांप सूंघ गया था। निरपराध हिंदुओं के करूण क्रंदन का किसी पर कोई असर नहीं था। कोलकाता की सड़कों पर पुरूष-महिलाओं और बच्चों की लाशें ही लाशें बिछ गईं। हिंदू दो दिनों तक दानवता के साये में लुटने-पिटने को मजबूर थे। लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार को भी दिखा दिया कि शंकर की तीसरी आंख खुलने का नतीजा क्या होता है?

वस्तुत: इतिहास के पन्ने पलटो तो उसमें से अनेक घाव स्वत: ही रिसने लगते हैं। समझदारी इसी बात में है कि इन घावों पर मरहम लगाने का काम किया जाए न कि इन घावों को फिर से उधेड़ उधेड़ कर देखा जाए कि ये ठीक हो रहा है या नहीं? जसवंत सिंह ने जो कार्य किया है वह घावों को कुरेदने के सिवाय कुछ नहीं है।

-राकेश उपाध्याय

जारी….

Sunday, August 23, 2009

जसवंत की पुस्तक इतिहास लेखन के साथ खिलवाड़

जसवंत सिंह की पुस्तक जिन्ना - इंडिया पार्टीशन इंडिपेंडेंस जिस दिन रिलीज़ हुई, नेहरू ऑडिटोरियम, दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में मैं उपस्थित था, उसके एक दिन पूर्व ही जिन्ना सीरीज़ लिखनी शुरू की थी, अब चूँकि पुस्तक पुरी पढ़ चुका हूँ और जसवंत सिंह के द्वारा उल्लिखित कुछ तथ्यों की छानबीन भी पूरी शिद्दत से कर रहा हूँ इसलिए ये कहने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है की जसवंत का जिन्ना प्रेम पूरे तौर पर इतिहास का साथी आकलन है, तथ्यों के साथ एकतरफा खिलवाड़ है। प्रस्तुत है प्रिय पाठकों के अवलोकनार्थ दूसरी किश्त जो जसवंत की पुस्तक के अंग्रेजी संस्करण को पढने के बाद लिखी गई है.

जिन्ना सीरीज़- दूसरा भाग

जसवंत सिंह अब भारतीय जनता पार्टी में नहीं हैं। उनके जिन्ना प्रेम ने अंतत: उन्हें अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बुरे दौर में लाकर खड़ा कर दिया।

जिन्ना के प्रति उनकी भक्ति कैसे जगी इसे वो खुद ही कई मर्तबा बयान कर चुके थे। 2005 में ‘लालजी’ के साथ जिन्ना प्रकरण को लेकर पार्टी ने जो व्यवहार किया था उससे जसवंत सिंह को बहुत ही धक्का पहुंचा था। तभी उन्होंने तय कर लिया कि वो जिन्ना के बारे में विस्तार से सच्चाई को सामने लाने का काम करेंगे।

अब जबकि जिन्ना के जिन्न ने उनकी बलि ले ली है और उनके प्रिय नेता ‘लालजी’ ने भी उन्हें गलत ठहरा दिया है तो उनके सब्र का बांध टूट चला है। उन्होंने भी पलटवार करते हुए यह कहने में संकोच नहीं किया कि लालजी के संकट के समय तो मैं उनके साथ खड़ा था लेकिन जब मुझ पर संकट आया तो वह किनारे खड़े हो लिए।

‘लालजी’ यानी लालकृष्ण आडवाणी जिन्होंने जून, 2005 में पाकिस्तान में जिन्ना के बारे में यह कहकर भारतीय राष्ट्रवादी जगत में हलचल मचा दी थी कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे, वे इतिहास निर्माता थे। अपनी बात को सच सिध्द करने के लिए आडवाणी जी ने तब पाकिस्तान की संविधान सभा में 11 अगस्त, 2005 को जिन्ना द्वारा दिए गए भाषण का हवाला दिया था।

जैसा कि जिन्ना सीरीज की पहली कड़ी में हमने स्पष्ट किया था कि जिन्ना द्वारा संविधान सभा में दिए गए इस भाषण को बाद में जिन्ना ने खुद ही वापस ले लिया था। इस संदर्भ में प्रख्यात पत्रकार बीजी वर्गीज के वक्तव्य को उध्दृत किया गया था जो वर्गीज ने जिन्ना पर जसवंत सिंह की पुस्तक के लोकार्पण समारोह से बाहर आते ही हिंदुस्थान समाचार के संवाददाता को अनौपचारिक बातचीत में बता दिया था। चूंकि ये वर्गीज ही थे जिन्होंने जिन्ना पर पुस्तक लोकार्पण के दौरान ही अनेक सवाल खड़े कर दिए थे। वे समारोह में उपस्थित आधा दर्जन से अधिक वक्ताओं में अकेले ऐसे वक्ता थे जिन्होंने सीधी कार्रवाई सहित अनेक सवालों को लेकर जिन्ना के सेकुलरिज्म पर सीधी चोट की थी ।

इस्लामिक गणराज्य के समर्थक थे जिन्ना

वस्तुत: जिन्ना ने संविधान सभा में दिए गए अपने कथित सेकुलर भाषण के थोड़े दिनों पूर्व 9 जून, 1947 को आयोजित मुस्लिम लीग की बैठक में ही ये स्पष्ट कर दिया था कि पाकिस्तान इस्लामिक गणराज्य बनेगा। मुस्लिम लीग के समूचे पाकिस्तान आंदोलन की बुनियाद ही इस्लामिक राज्य पर आधारित थी।

चूंकि संविधान सभा में जिन्ना द्वारा दिया गया भाषण अप्रत्याशित था इसलिए बैठक में हलचल मच गई। जिन्ना का भाषण समाप्त होते ही प्रधानमंत्री लियाकत अली खां ने राष्ट्रीय ध्वज का सवाल खड़ा कर मामले को किनारे लगाने का सफल प्रयास किया। अगले दिन पाकिस्तान के सभी प्रमुख अखबारों में ये खबर नदारद थी कि कायदे आजम ने अपने भाषण में पाकिस्तान को सेकुलर स्टेट बनाने की बात कही है। जाहिर है जो भाषण बाद में प्रेस को जारी किया गया उसमें से आधिकारिक रूप से वो सारी लाइनें हटा दी गईं जिनका जिक्र कर भारत में जिन्ना को सेकुलर बताने का काम शुरू किया गया है।

जिन्ना ने संविधान सभा में दिए गए अपने कथित सेकुलर भाषण के थोड़े दिनों पूर्व 9 जून, 1947 को आयोजित मुस्लिम लीग की बैठक में ही ये स्पष्ट कर दिया था कि पाकिस्तान इस्लामिक गणराज्य बनेगा।

भारत विभाजन पर लिखी गई ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ नामक सुप्रसिध्द पुस्तक में इस बात को विद्वान लेखक कॉलिन्स और डोमिनिक लैपियर ने भी स्वीकार किया है संविधान सभा में जिन्ना का भाषण अप्रत्याशित और चौंकाने वाला था। ये उनके अब तक के स्टैण्ड से विपरीत बात थी। जिन्ना की जीवनी पर काम करने वाले अनेक लेखकों ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि बाद में जिन्ना की सहमति से आधिकारिक रूप से भाषण को संशोधित कर दिया गया।

सवाल उठता है कि जिन्ना ने संविधान सभा के सम्मुख इस प्रकार की नितांत भिन्न भाषा में बात क्यों की जिसे उस समय के हालात में कोई भी समझदार पाकिस्तानी मुसलमान स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। तत्कालीन पाकिस्तान सरकार तो कतई इस मूड में नहीं थी। वस्तुत: इसके उत्तर में उस सत्ता संघर्ष के बीज छुपे हुए थे जिससे पाकिस्तान आज भी जूझ रहा है।

खैर, संविधान सभा की बैठक में हुए इस भाषण को लेखन की चूक ठहराकर मामले को रफा-दफा कर दिया गया। 18 अगस्त, 1947 को अपनी चूक को दुरूस्त करते हुए जिन्ना ने अपने ईद संदेश में कहा कि ‘केवल पाकिस्तान ही नहीं इस उपमहाद्वीप के समस्त मुसलमानों की चिंता का दायित्व भी हमारा ऊपर आन पड़ा है।’
पुन: दिसंबर, 1947 में कराची में मुस्लिम लीग की परिषद् की बैठक में जिन्ना ने कहा-’भारत में जो मुसलमान रह गए हैं उनके हितों की चिंता मुझे सताने लगी है। इस उद्देश्य के लिए फौरी तौर पर हमें मुस्लिम लीग की इकाई को भारत में बनाए रखना चाहिए।…ऐसा देखने में आ रहा है कि भारत में मुसलमानों की पहचान खत्म करने में कुछ लोग जुट गए हैं, हमें ये हरगिज नहीं होने देना है और यदि आवश्यकता पड़ी और लीग की ओर से मुझे अनुमति दे दी जाए तो मैं भारत के मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए भारत में जाकर फिर से रहने को तैयार हूं।’

jaswant सिंह से मैं गुजारिश करूँगा की वह चाहें तो अपने पाकिस्तान के मित्रों के मध्यम से उपरोक्त तथ्यों के बारे में असलियत का पता लगा लें।

जिन्ना के मन में हिंदुओं के प्रति कितनी भयानक घृणा ने घर कर लिया था इसे समझने केलिए इतना ही कहना पर्याप्त है कि उसने अपने हिंदू अतीत को स्वीकार करने से भी इंकार कर दिया। जसवंत सिंह तो अपनी पुस्तक में लिखा है कि गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र ने इतिहास की दो महान हस्तियों का उदय एक साथ देखा-एक थे गांधी तो दूसरे थे मोहम्मद अली जिन्ना। लेकिन इस सच के विपरीत पाकिस्तान में जिन्ना को ईरानी मूल का कहने वालों की जमात भी पैदा हो गई है जो जिन्ना के हिंदू मूल को अब सिरे से नकारती है तो ऐसा क्यों हुआ। इसके पीछे खुद जिन्ना द्वारा अपने हिंदू अतीत से किया गया इंकार ही जिम्मेदार है।

'कायदे आजम' के प्रति इतनी दीवानगी क्यों?

पिछले कुछ दशकों से समूचे पाकिस्तान के इतिहासकारों और लीगी लेखकों में इस बात की होड़ मची हुई है कि किस प्रकार कायदे आजम की छवि को दुनिया भर में निखारा जाए। ये इतिहासकार और लेखक इस बात पर सदा नाराजगी प्रकट करते आए हैं कि जो स्थान विश्वपटल पर गांधी को मिला, जो स्थान नेहरू को मिला वो स्थान हमारे कायदे आजम को क्यों ना मिल सका। पाकिस्तान के इतिहासकार अजीज बेग कहते हैं- ‘कायदे आजम जिन्ना को वह स्थान नहीं मिल सका जिसके वे वास्तव में हकदार थे।’
पाकिस्तान के संदर्भ में एक अत्यंत प्रामाणिक अनुसंधान आधारित पुस्तक ‘पाकिस्तान: जिन्ना से जिहाद तक’ में लेखक एस.के.गुप्ता और राजीव शर्मा ने इस बात को प्रथम अध्याय में ही रेखांकित किया है कि ‘पाकिस्तानी इतिहासकार जिन्ना को उपेक्षित स्थान से निकालकर एक सजीव-जीवंत व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करने के लिए उतावले हैं’।

उपरोक्त लेखकों का ये निष्कर्ष सन् 2003 में ही सामने आ गया था जब उनकी पुस्तक पहली बार प्रकाशित हुई थी। अजब संयोग है कि उसके बाद हम भारत में जिन्ना के महिमामण्डन की बढ़ती कोशिशों को लगातार देख सकते हैं।

श्री आडवाणी ने अपनी पुस्तक 'माई कंट्री माई लाइफ' में एक स्थान पर जिक्र किया है कि पाकिस्तान में नियुक्त एक विदेशी राजदूत ने उनसे यह कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच सम्बंध तभी मधुर और प्रगाढ़ हो सकते हैं जबकि पाकिस्तान में सत्ता एक सशक्त सैनिक कमान के हाथ में रहे और इधर भारत में धुर दक्षिणपंथ यानी हिंदुत्व की वकालत करने वाले दिल्ली में आसीन हों।
उस राजदूत के शब्दों को यदि जिन्ना के व्यक्तित्व के मण्डन के संदर्भ में लागू किया जाए तो ये निष्कर्ष निकालने में कितनी देरी लगेगी कि जब तक धुर दक्षिणपंथ जिन्ना की वकालत शुरू नहीं करता तब तक जिन्ना को लोकप्रिय बनाना या उसकी स्वीकार्यता विश्व पटल पर बढ़ा सकना आसान नहीं होगा।
इस संदर्भ में यह देखना भी रोचक है कि जसवंत सिंह की पुस्तक की लोकप्रियता पाकिस्तान में भी आसमां छू रही है। और तो और पुस्तक लोकार्पण समारोह में पाकिस्तान से आए अतिथियों की संख्या भी अच्छी खासी रही थी।

जसवंत ने किताब में झूठी बातें लिखीं

परंतु कोई भी लेखक या इतिहासकार ये कैसे भूल सकता है जिन्ना द्वारा 'सीधी कार्रवाई' के एलान के पूर्व तक समूची कांग्रेस एक ओर विभाजन के खिलाफ खड़ी थी और जिन्ना विभाजन की जिद पर अड़ा हुआ था। आखिर जिन्ना ने भारत का विभाजन करवा कर ही दम लिया। वह विभाजन जिसमें डेढ़ करोड़ लोग बेघरबार हुए, बीसों लाख लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, माताओं, स्त्रियों और बच्चों की जो दुर्दशा हुई उसकी कल्पना करना भी आज कठिन हो चुका है।

खैर इस सवाल पर आज बहस हो रही है कि जिन्ना की आखिर कौन सी मजबूरी थी कि उसने इतना भयानक कदम उठा लिया। जसवंत सिंह इसके लिए गाँधी, पंडित नेहरू और सरदार पटेल को जिम्मेदार ठहराते हैं। अपनी थीसिस को सही ठहराने की शुरूआत करते हुए जसवंत सिंह अपनी पुस्तक में लिखते हैं-'गांधी जनवरी, 1915 में पानी के जहाज से भारत पहुंचे।…तब तक जिन्ना अखिल भारतीय नेता के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुके थे। जिन्ना न सिर्फ हिंदुओं और मुसलमानों, नरमपंथी और गरमपंथी कांग्रेसियों के बीच एकता का सूत्र बनकर उभरे थे वरन् भारत के विविध वर्गों में उनकी पर्याप्त पहुंच स्थापित हो चुकी थी।…जिन्ना ने मुंबई में गांधी के स्वागत के लिए 13 जनवरी, 1915 को गुर्जर समुदाय द्वारा आयोजित एक सभा की अध्यक्षता की। इस सभा में जिन्ना ने जहां गांधी की जमकर प्रशंसा की वहीं गांधीजी ने जिन्ना को हतोत्साहित और अपमानित करने वाला वक्तव्य दिया।’

यहां सवाल उठता है कि गांधी ने जिन्ना का क्या अपमान कर दिया। जसवंत सिंह के अनुसार, जिन्ना ने इस सभा में गांधी को आजादी के आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कुछ सुझाव दिए जिस पर गांधी ने मात्र इतना कहकर चुप्पी साध ली कि अभी तो मैं विदेश से आया हूं, परिस्थिति का अध्ययन कर निर्णय करूंगा। वैसे भी गांधी को गोपाल कृष्ण गोखले ने निर्देशित किया था कि वो सर्वप्रथम भारत को समझें। अब इस छोटी सी बात को जिन्ना ने दिल पर ले लिया तो इसे क्या समझा जाए। गोखले का निर्देश तो जिन्ना भी उनके जिंदा रहते अक्षरश: मानते रहे। जिन्ना ने 1920 के बाद से ही आजीवन सारे हिंदू नेताओं की जमकर बखिया उधेड़ी लेकिन जिन नेताओं के बारे में जिन्ना ने कभी एक भी अपशब्द या निंदाजनक बात नहीं निकाली उनमें से गोपाल कृष्ण गोखले और लोकमान्य तिलक का नाम अग्रणी है।

जसवंत सिंह आगे लिखते हैं-…गांधी ने सन् 1920 तक सभी के साथ सहयोगात्मक रवैया रखा लेकिन 1920 के बाद वे खुद ही सर्वेसर्वा हो गए। इसके पीछे गोखले का वह समर्थन था जिसमें उन्होंने ब्रिटिश सरकार और वॉयसराय लार्ड हार्डिंग को गांधी के पीछे खड़े रहने के लिए अपनी सारे प्रभाव और शक्ति का इस्तेमाल किया। ये वह समय था जब जिन्ना से ब्रिटिश सरकार सशंकित थी क्योंकि वह हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल पैरोकार थे और सरकार के लिए ये कठिन हो गया था कि वह मुस्लिम लीग को कांग्रेस से अलग रख सके।…इस पूरे कालखण्ड में गांधी की नीति और रवैया पूरे तौर पर धर्म से प्रभावित एक प्रादेशिक भाव भावना से युक्त नेता के समान था जबकि इसके विपरीत जिन्ना नि:संदेह संप्रदाय निरपेक्ष और राष्ट्रवादी भावना से लबरेज थे।…पृष्ठ-102
अब इसे पक्षपात पूर्ण दृश्टिकोण नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे। यहां दो बातें जसवंत सिंह कह रहे हैं। जिसमें से एक गोखले से संबंधित है कि गोखले ने गांधी के पीछे समूची ब्रिटिश सरकार को खड़ा किया। अब इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है। इतिहास के अध्येता जानते हैं और जसवंत सिंह भी लिख रहे हैं कि गांधी जनवरी, 1915 में विदेश से भारत आए। दूसरी ओर 19 फरवरी, 1915 में गोपाल कृष्ण गोखले का निधन हो गया। आखिर ब्रिटिश सरकार से गांधी के ताल्लुकात बनवाने में गोखले को समय कब मिला? ये बात सही है कि गांधी उनसे कई बार मिलने गए, उन्होंने भी गांधी को आषीर्वाद दिया और देश को घूमने, जानने और समझने का निर्देश भी। लेकिन गोखले गांधी और ब्रिटिश हुक्मरानों के बीय ताल्लुकात बनवाने में सक्रिय थे, ये निराधार और झूठी बात भला कौन स्वीकार करेगा। दूसरी बात कि लोकमान्य तिलक उदारवादियों की लाइन पर आ गए तो इसे भी स्वीकार कर पान कठिन है। तिलक ने 1914 में माण्डले कारावास से लौटने के बाद कांग्रेस और उसके उदारवादी खेमे को बुरी तरह से फटकारा और कहा कि इस उदारवादी टोले ने कांग्रेस का प्रभाव ही देश से खत्म कर दिया है। तिलक ने पूर्ण स्वराज्य के सवाल को लेकर कभी समझौतावादी रूख नहीं अपनाया। इसी से पता चलता है कि जसवंत सिंह की पुस्तक कितने पूर्वाग्रहों से भरी है।

आज दिनांक २३.८.२००९ को वरिष्ट पत्रकार कारन थापर के साथ बातचीत में भी जसवंत सिंह ने dohraya- की लखनऊ paikt के दौरान गोखले ने जिन्ना को हिंदू-मुस्लिम एकता kaa दूत कहा। paathak gan jante होंगे ki pharwari, 1915 me hi gokhle ki mrutyu ho gai thi jabki lucknow pact 1916 me hua jisme lokmanya tilak ki mukhya bhumika thi.

शौकीन मिजाज जिन्ना और देशभक्त गांधी

हिंदुस्थान की राजनीति को गौर से देखने वाला कौन अध्येता जसवंत सिंह की इस ‘थ्योरी’ को स्वीकार करेगा कि 'गांधी एक प्रादेशिक भाव भावना वाले पांथिक नेता थे और जिन्ना परम धर्मनिरपेक्ष व देशभक्त था।' वस्तुत: जिन्ना कुछ हद तक अपने स्वार्थों के लिए ही राष्ट्रवादी थे और उनकी लोकप्रियता ऐसी भी नहीं थी कि देश उन्हें हाथों हाथ ले रहा था।
सभी जानते हैं कि भारत की परंपरा में सार्वजनिक जीवन में सादगी को पहले कितना भारी स्थान लोकमानस देता आया था। और जैसा कि जिन्ना का व्यक्तिगत जीवन सार्वजनिक रूप से लोग देखते थे उस हिसाब से हिंदुस्तान की कसौटी पर जिन्ना कभी खरे उतर ही नहीं सकते थे। वो महंगे से महंगे ब्राण्ड की शराब के शौकीन थे। अपने बेटी की उम्र की एक अति धनाढय पारसी लड़की को भगाकर उन्होंने विवाह कर लिया था। मुंबई के सुप्रसिद्ध पारसी उद्योगपति दिन्शा पेटिट की बेटी रत्ती से उन्होंने 16 अप्रैल, सन् 1918 को जब विवाह किया तो जिन्ना 52 साल के थे और रत्ती मात्र 16 साल की लड़की थी। जिन्ना ने विवाह करने के लिए उसे इस्लाम धर्म में मतांतरित किया और ये सब बातें उस समय बहुत ही मशहूर हो गईं थीं क्योंकि दिनशा पेटिट जिन्ना के मित्र थे।

हिंदुस्थान की राजनीति को गौर से देखने वाला कौन अध्येता जसवंत सिंह की इस ‘थ्योरी’ को स्वीकार करेगा कि 'गांधी एक प्रादेशिक भाव भावना वाले पांथिक नेता थे और जिन्ना परम धर्मनिरपेक्ष व देशभक्त था।'

जिन्ना उस समय एक विधुर का जीवन व्यतीत कर रहे थे। दिनषॉ पेटिट को तो ये अपेक्षा भी नहीं थी कि 52 साल के विधुर जिन्ना उनकी बेटी पर डोरे डाल रहे हैं। उन्हें ये झटका बर्दाश्त नहीं हुआ और इसलिए उन्होंने अपनी बेटी को मुक्त करवाने के लिए जिन्ना के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की और भी जो संभव तरीके थे, सभी आजमाए। ये बात और है कि ये वैवाहिक बंधन ज्यादा समय तक नहीं चला। रत्ती ने विवाह के 9 साल बाद ही उनसे तलाक ले लिया। इसी रत्ती से जिन्ना को जीवन में इकलौती संतान बेटी दीना के रूप में प्राप्त हुई जो आगे चलकर जिन्ना से अलग हो गई। दीना ने मुंबई के एक पारसी vaadiya परिवार में विवाह किया और कालांतर में अमेरिका में रहने लगीं।

इस प्रकरण पर जसवंत सिंह कुछ नए प्रकार से रोशनी डालते हैं- ‘अपनी दूसरी पत्नी से जिन्ना के संबंध बिगड़ गए थे। दोनों एक दूसरे से अलग रहने लगे। भारत के स्वतंत्रता समर का उनके वैवाहिक जीवन पर असर पड़ा। वैवाहिक संबंधों को समय और परवाह की जरूरत होती है लेकिन जिन्ना तो आजादी के संग्राम में ही व्यस्त थे। परिणामत: दोनों अलग अलग हो गए। 1929 में पत्नी का देहांत हो गया। बेटी डिना की जिम्मेदारी जिन्ना पर आ गई और उन्हें अपने राजनीतिक भागमभाग वाली जिंदगी में बदल करना पड़ा। बेटी के कारण वे लंदन रहने लगे।’
यानी इससे ज्यादा बेतुकी बात क्या लिखी जा सकती है कि ‘जिन्ना आजादी के आंदोलन में इतने ज्यादा सक्रिय थे कि पत्नी से रिश्ते बिगड़ गए।' क्या वो अकेले इस लड़ाई में शामिल थे? देश में और नेताओं के पत्नियां नहीं थीं? जसवंत सिंह ने समूची पुस्तक में कहीं ये नहीं बताया कि जिन्ना आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण कितनी बार जेल गए? लेकिन इसके विपरीत जसवंत ने हर बार लिखा है कि जिन्ना भारत की आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। इससे झूठी बात भला और क्या हो सकती है? जिन्ना तो विभाजन की लड़ाई लड़ रहे थे और वह भी ब्रिटिश हुक्मरानों के इशारे पर लड़ रहे थे।

सुअर के मांस सहित जितने प्रकार के मांस हो सकते हैं सभी का स्वाद लेने में जिन्ना रसिक थे, एक बार जो टाई पहन ली तो उसे दुबारा नहीं पहन सकते थे, उनके वार्डरौब में 200 से अधिक सूट एक समय रहा करते थे और ऐसे ही विलायती अन्य कपड़ों का अंबार लगा हुआ रहता था। सिगरेट के वे इतने शौकीन थे कि 50 से अधिक सिगरेट रोज फूंक जाते थे और वह भी यूरोप के सबसे मंहगे ब्रांड की सिगरेट जो ‘क्रेवन ए’ के नाम से प्रसिध्द थी।

बादशाही चाहत ने जिन्ना को भटकाया

अजब बात ये है कि जसवंत सिंह ने अपनी किताब में जिन्ना को दरकिनार करने का आरोप कांग्रेस नेताओं पर मढ़ दिया है लेकिन जिन्ना के इस चरित्र पर उन्होंने जरा भी कलम नहीं चलाई है। जसवंत सिंह राष्ट्रवाद से जिन्ना की दूरी बनने के कारणों पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं- ‘नागपुर कांग्रेस अधिवेशन तक आते आते जिन्ना कांग्रेस पार्टी में किनारे लगा दिए गए। गांधी ने 1915 के बाद के छ: सालों में न केवल मुसलमानों को बड़ी संख्या में अपने पक्ष में खड़ा कर लिया वरन् बड़ा भारी आर्थिक समर्थन भी हासिल कर लिया। गांधी ने खुद को आजादी के आंदोलन के नायक के रूप में स्थापित कर लिया जिसे जिन्ना कभी प्राप्त नहीं कर पाए। अमृतसर से कोलकाता और फिर1920 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन के आते आते गांधी देश में छा गए।’

पिछली कड़ी में जैसा कि हमने उल्लेख किया था कि जिन्ना सन् 1911 से ही मुस्लिम लीग के कार्यक्रमों में आने जाने लगे थे, सन् 1913 में ही बाकायदा उन्होंने लीग की सदस्यता ग्रहण कर ली। कांग्रेस के अधिवेशनों में जिन्ना अपने आचरण के कारण कुछ ज्यादा ही चर्चित रहते थे। उनका नवाबी ठाट, aisho -आराम का प्रदर्शन , सिगरेट और बदमिजाज टिप्पणियां ही उन्हें चर्चित रखने के लिए पर्याप्त होती थीं। यदि कोई उनसे लगातार मुंह में सिगरेट पीते रहने पर कुछ कहता था तो उनका तपाक से जवाब हाजिर हो जाता था-तेरे बाप का पीता हूं क्या? ऐसे में जब गांधी जी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को खादी, सादगी और सत्याग्रह अपनाने का मंत्र दिया तो जिन्ना उबल पड़े। उस वक्त कांग्रेस के अधिवेशनों में एक ओर जहां विलायती कपड़े के खिलाफ लोग holika jalate तो जिन्ना dusare किनारे पर खड़े होकर अपने विलायती वस्त्रों में सिगरेट की कश खींचने में मशगूल रहते।
जसवंत सिंह का मानना है कि गांधी और नेहरू ने जिन्ना को कांग्रेस में किनारे लगा दिया। किंतु जिन्ना के आचरण को देखकर क्या किसी समझदार आदमी को ये समझने में देर लगेगी कि जिन्ना ने खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली थी।

जसवंत लखनऊ पैक्ट को लेकर जिन्ना की प्रशंसा करते नहीं थकते। इस पैक्ट में जिन्ना ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन का विरोध किया था। लेकिन क्या ये वास्तविकता नहीं है कि लखनऊ पैक्ट में ही पहली बार मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन को सैध्दांतिक सहमति प्रदान की गई थी? वास्तविकता तो यही है कि जिन्ना जिस मिजाज के व्यक्ति थे वो कभी भी सर्वसाधारण हिंदुओं के बीच raashtriiy नेता के रूप में स्वीकार नहीं हो सकते थे।
जिन्ना के पाकिस्तानपरस्त बनने पर जसवंत सिंह का एक और vishleshan गौर फरमाने लायक है-
‘1927 के कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन से जिन्ना ने तय कर लिया कि उसके रास्ते अब कांग्रेस से अलग हो चुके हैं।…जिन्ना के मन में अन्तर्द्वंद्व तेज हो गया कि वह कांग्रेस कैंप में रहे या मुस्लिम कैम्प में। वह अब दोनों में नहीं रह सकता था। इसी द्वन्द्व के कारण जिन्ना की कायदे आजम की यात्रा शुरू हो गई। मुसलमान ब्रिटिश सरकार की ओर झुक चले थे। जिन्ना पर मुस्लिम नेताओं ने इस बात का जवाब देने का दबाव बढ़ा दिया कि जिन्ना मुसलमानों के साथ हैं अथवा नहीं? इधर भारत की राजनीति विभक्त हो चली थी, सरकार और मुसलमान एक पक्ष में तो कांग्रेस तथा हिंदू दूसरी तरफ खड़े थे।’
जैसा कि पूर्व में मुद्दा आ चुका है कि जिन्ना कांग्रेस पर अपना वर्चस्व चाहते थे लेकिन उनके आचरण ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। अपने स्वभाव के कारण वो कांग्रेस के अनुशासन और देश के लोकजीवन की मान्यताओं के विरूध्द होते चले गए। क्यों हुआ ऐसा तो इसका उत्तर जिन्ना के भाई के हवाले से मिलता है। मोहम्मद अली जिन्ना के भाई अहमद अली जिन्ना ने सन् 1946 में अपने भाई के पाकिस्तान प्रेम को रेखांकित करते हुए कहा था-’उन्हें तो इस्लाम या पाकिस्तान में कोई दिलचस्पी नहीं थी, वह तो खुद को बादशाह के तौर पर देखने के लिए लालायित थे।’

जसवंत सिंह को ये चीजें क्यों नहीं दिखाई detin.
अगली कड़ी में सरदार पटेल, चर्चिल की भूमिका, विभाजन और मुस्लिम लीग की सीधी कार्रवाई से sambandhit जसवंत की पुस्तक के अन्य विवादित अंशों पर हम प्रकाश डालेंगे।
जारी…